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बदला : ये कैसा बदला है कि निर्देशक ने कुछ नहीं बदला है!

By Outcome.c :09-03-2019 08:38


हमारे यहां ब्रॉडबैंड की लगातार बढ़ रही रफ्तार कई सारे उद्योगों के समीकरण बदल रही है. अमेरिका की तरह यहां भी जल्द ही ‘स्मार्ट होम’ का कॉन्सेप्ट घरों में सुचारू रूप से काम करने लगेगा क्योंकि ऑप्टिकल फाइबर की मदद से इंटरनेट प्रदान करने वाली कुछ कंपनियों ने सौ एमबीपीएस तक की रफ्तार से डाटा डाउनलोड करने की सुविधा देना शुरू कर दिया है. यह रफ्तार जल्द ही एक गीगाबाइट तक पहुंचेगी और ऑप्टिकल फाइबर का जाल देशभर में फैलते ही ‘स्मार्ट होम’ की परिकल्पना अमेरिका की तरह ही हिंदुस्तान में भी साकार होना शुरू हो जाएगी.

इसी (असली और सस्ते) तेज रफ्तार इंटरनेट के चलते नेटफ्लिक्स और अमेजॉन प्राइम जैसे ऑनलाइन मंच भी घर-घर तक पहुंच रहे हैं और बची-खुची बफरिंग वाली थकाऊ प्रक्रिया कुछ ही वक्त में गुजरे कल की बात होने वाली है. ब्रॉडबैंड की रफ्तार में आए इसी बदलाव के चलते हिंदी फिल्म उद्योग के भी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, लेकिन दुख की बात है कि यह उद्योग और इसके फिल्मकार इस बदलाव को ठीक से भांप नहीं पा रहे.

अब जब दर्शक घर बैठे नेटफ्लिक्स पर बेहतर से बेहतरीन देसी-विदेशी फिल्में देख सकता है तो वो क्यों विदेशी सिनेमा से प्रेरित साधारण फिल्में देखने सिनेमाघर जाएगा? या तो उसे चुनिंदा सितारों का मोह होगा या फिर वो परदे पर कुछ ऐसा देखना चाहेगा जो कि उसके घर के साठ-सत्तर इंच के स्मार्ट टीवी पर नहीं मिलेगा. सुजॉय घोष की ‘बदला’ के पास ऐसे सितारे नहीं हैं जिन्हे देखने के लिए दर्शक सिनेमाघरों तक खिंचा चला आए. ऊपर से ‘बदला’ जब अपने ओरिजनल और बेहतर रूप में घर बैठे ही नेटफ्लिक्स पर देखने को मिल रही है, तो केवल बदले हुए चेहरों और स्पेनिश की जगह हिंदी भाषा को सुनने के लिए आखिर कितने दर्शक सिनेमाघर जाना चाहेंगे?

‘कहानी’ वाले सुजॉय घोष की ‘बदला’ स्पेनिश फिल्म ‘द इनविजिबल गेस्ट’ का आधिकारिक रीमेक है और इसकी पटकथा को सीन दर सीन नए चेहरों और नयी भाषा के साथ फिल्माया भर गया है. कुछ नए संवाद जोड़े गए हैं और महाभारत की कुछ उक्तियों और व्यक्तियों का उदाहरण भर लेकर फिल्म को गहरा फलसफा देने की कम कामयाब कोशिश की गई है. ‘द इनविजिबल गेस्ट’ पिछले काफी वक्त से नेटफ्लिक्स पर मौजूद है और दुनिया-भर की उम्दा व दर्शनीय फिल्मों पर नजर रखने वाले सिनेप्रेमी इसे काफी पहले देख भी चुके होंगे. इसलिए ‘बदला’ के प्रति उत्सुकता केवल सुजॉय घोष के चलते पैदा हुई थी, कि आखिर वे किस अंदाज में बदला लेने की इस परिचित कहानी को बदल देंगे.

ऐसा होते हुए हमने ‘कहानी’ में देखा है. एंजेलिना जोली की फिल्म ‘टेकिंग लाइव्स’ (2004) से खलनायक को पकड़ने के लिए गर्भवती होने का नाटक करने वाली नायिका का आइडिया लेकर सुजॉय घोष ने उसे एक शानदार पटकथा में पिरोया था और उस पटकथा का उतना ही कुशल निर्देशन कर उम्दा ‘कहानी’ रची था. वैसा ही कुछ शानदार बदलाव ‘बदला’ से भी अपेक्षित था, लेकिन यह केवल ‘द इनविजिबल गेस्ट’ की सीन दर सीन नकल बनकर रह गई है.

बस कुछ किरदारों के जेंडर बदल दिए गए हैं. जिस मुख्य भूमिका को मूल फिल्म में एक अभिनेता ने निभाया था वह तापसी पन्नू निभा रही हैं और दूसरी जिस मुख्य भूमिका में एक अधेड़ अभिनेत्री मौजूद थीं उनकी जगह अमिताभ बच्चन ने ले ली है. ऐसे ही कुछ और भी हेर-फेर किए गए हैं जिसकी वजह से दर्शनीय अभिनय करने के बावजूद अमृता सिंह कहानी की अमिताभ बच्चन नहीं बन पातीं.

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इस तरह का तरीका सुजॉय पहले भी ‘तीन’(2016) नाम की सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म में इस्तेमाल कर चुके हैं. इसका उन्होंने निर्माण किया था और कोरियाई फिल्म ‘मोंटाज’ का हूबहू अनुवाद करने के दौरान चरित्रों के जेंडर की हेरा-फेरी भर की थी. यह तरीका दिलचस्प जरूर है – खासकर तापसी को लेने की वजह से हुआ जेंडर -रिवर्सल – लेकिन फिर भी अपनी-अपनी फिल्म के दायरों में कोई खास असर नहीं छोड़ता. ‘बदला’ में कुछ सह-कलाकार तो मूल फिल्म जितना प्रभाव भी नहीं छोड़ पाते.

साफ समझ आ रहा है कि ‘कहानी’ जैसी दमदार मिस्ट्री-थ्रिलर की लीगेसी को आगे बढ़ाने के लिए ही सुजॉय घोष हर साल इस जॉनर में नए-नए प्रयास कर रहे हैं. लेकिन इन प्रयासों में वे मौलिक लेखन की तरफ ध्यान देने के बजाय मशहूर विदेशी फिल्मों से ज्यादा प्रेरणा ले रहे हैं और इसलिए बार-बार असफल हो रहे हैं.

‘बदला’ में ज्यादातर घटनाक्रम एक घर के अंदर घटता है और वहां भी मुख्यता से एक टेबल के आर-पार बैठकर ही अमिताभ बच्चन और तापसी पन्नू के बीच संवाद होता है. तापसी के अभिनय की सीमित रेंज इस दौरान दर्शकों से छिपी नहीं रह पाती और क्लोजअप शॉट्स से लेकर एक जगह में बंध जाने की मजबूरी से उन जैसी सशक्त अभिनेत्री भी पार नहीं पा पाती. अपने जटिल किरदार नैना से भी उनका जुड़ाव कम मालूम होता है और उनका अभिनय ज्यादातर वक्त वन-नोट ही रहता है.

बच्चन चूंकि बच्चन हैं, इसलिए तकरीबन पूरी ही फिल्म में टेबल-चेयर के इर्द-गिर्द रहने के बावजूद दर्शनीय अभिनय करते हैं. सोदाहरण दिखाते हैं कि उनके अभिनय की वृहद रेंज को सीमित समय, सीमित स्पेस और सीमित चरित्र-चित्रण भी बांध नहीं सकता. ये अलग बात है कि यहां वे ऐसा कुछ नहीं करते जो अनदेखा हो, और जो-जितना करते हैं उतना तो अब उनके बाएं हाथ का खेल है. या कहें कि बाएं हाथ की केवल दायीं उंगली का खेल है!

‘बदला’ उस स्तर का तनाव भी लगातार बरकरार नहीं रख पाती जैसा कि घोर बातचीत आधारित ‘द इनविजिबल गेस्ट’ आखिर तक बरकरार रखने में कामयाब रही थी. इसकी मुख्य वजह आपको दोनों फिल्मों का ट्रेलर यूट्यूब पर एक के बाद एक देखने पर पता चल ही जाएगी. जहां ‘द इनविजिबल गेस्ट’ एक अहम किरदार को साधारण बनाकर आखिर तक अपनी मिस्ट्री बचाकर रखने में घोर सफल हुई थी, वहीं ‘बदला’ शुरू से ही उस किरदार को फिल्म में हावी दिखाकर अपना राज दर्शकों की तेज नजर में बहुत पहले ही खोल देती है. इस बदली हुई एप्रोच की मुख्य वजह बॉलीवुड का यूं बाजारू हो जाना है कि बिना मशहूर सितारों के ये कोई फिल्म दर्शकों को बेच ही नहीं पाता.

इसलिए, ‘बदला’ सिर्फ उन दर्शकों के लिए है जो नेटफ्लिक्स पर ओरिजनल फिल्म ‘द इनविजिबल गेस्ट’ देखने की जहमत तक नहीं उठा सकते. या फिर उनके लिए है जिनके पास नेटफ्लिक्स का अकाउंट नहीं है और उनके ऐसे दोस्त नहीं हैं जो अपना अकाउंट उनसे साझा करने को तैयार हों. ऐसी स्थिति हो तो ‘बदला’ देखने की फिकर छोड़िए, पहले अपने दोस्त बदलिए!

बाकी, नेटफ्लिक्स की दुनिया से दूर रहने वाले और असली-नकली की चिंता किए बगैर हिंदी फिल्मों में केवल मनोरंजन ढूंढ़ने वाले दर्शकों के लिए भी ‘बदला’ एक औसत मिस्ट्री-थ्रिलर ही साबित होगी. ‘कहानी’ वाले सुजॉय घोष अभी भी वापस नहीं लौटे हैं.

Source:Agency

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