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सबरीमाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट में देवासम बोर्ड का यू टर्न

By Outcome.c :07-02-2019 09:11


केरल में सबरीमाला मंदिर का प्रबंधन देखने वाले त्रवनकोर देवासम बोर्ड ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के मामले में यू टर्न लिया है। मंदिर बोर्ड ने अपना पूर्व रुख बदलते हुए बुधवार को हर आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन किया।

बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि अब किसी भी वर्ग के साथ जैविक बदलाव के आधार पर भेदभाव न किये जाने का वक्त आ गया है। जैविक बदलाव के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। समानता संविधान का मूल तत्व है। इसके अलावा केरल सरकार ने भी फैसले का समर्थन करते हुए पुनर्विचार याचिकाओं का विरोध किया। बोर्ड और सरकार की ओर से ये दलीलें सबरीमाला मंदिर में हर आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश देने वाले फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दी गईं। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले का पक्ष और विरोध करने वाले सभी लोगों की बहस सुनकर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

पिछले वर्ष 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बहस के दौरान बोर्ड ने पाबंदी का समर्थन किया था। लेकिन बुधवार को बोर्ड के वकील राकेश द्विवेदी ने पाबंदी हटाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए स्वीकार किया कि उनका रुख बदला है और बोर्ड ने कोर्ट का फैसला स्वीकार किया है। बोर्ड ने जोरदार शब्दों में पूजा अर्चना के अलावा हर क्षेत्र में महिलाओं को बराबरी का हक देने की पैरवी की।

सुप्रीम कोर्ट ने गत वर्ष 28 सितंबर को केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी को लिंग आधारित भेदभाव ठहराते हुए रद कर दिया था। महिलाओं पर यह पाबंदी उनके मासिक धर्म के कारण थी। फैसला 4-1 के बहुमत से था। जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने बहुमत से असहमति जताई थी। इस फैसले का अयैप्पा अनुयायी भारी विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि मंदिर के भगवान अयैप्पा ब्रम्हचारी हैं और इस आयु की महिलाओं के प्रवेश से मंदिर की प्रकृति बदल जाएगी। फैसले के खिलाफ कुल 55 पुनर्विचार याचिकाओं सहित कुल 65 याचिकाएं कोर्ट में हैं। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई,आरएफ नारिमन, एएम खानविल्कर, डीवाई चंद्रचूड़ और इंदू मल्होत्रा की पीठ ने पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई की। कोर्ट ने पक्षकारों को लिखित दलीलें देने के लिए सात दिन का वक्त दिया है। मूल फैसला देने वाली पीठ में जस्टिस दीपक मिश्रा शामिल थे। उनके सेवानिवृत होने के कारण पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करने वाली पीठ मे उनकी जगह जस्टिस गोगोई शामिल हैं।

सुनवाई के दौरान अयैप्पा अनुयायियों और अन्य याचिकाकर्ताओं ने फैसले का विरोध करते हुए कहा कि इसमें संविधान के अनुच्छेद 17 (छुआछूत की मनाही) और 15 (लिंग आधारित भेदभाव की मनाही) की सही व्याख्या नहीं की गई है। वरिष्ठ वकील के.परासरन ने कहा कि अनुच्छेद 15 धर्मनिरपेक्ष श्रेणी के सार्वजनिक संस्थाओं में प्रवेश में भेदभाव की मनाही करता है न कि धार्मिक में। अनुच्छेद 17 भी यहां लागू नहीं होगा। इस पर जस्टिस नारिमन ने सवाल किया कि अगर 10 से 50 वर्ष की अनुसूचित जाति की महिला को प्रवेश से रोका जाता है तो क्या वहां अनुच्छेद 17 आएगा।

परासरन का जवाब था कि मंदिर मे पाबंदी मूर्ति की ब्रम्हचारी प्रकृति के कारण है न कि जाति के आधार पर। उधर दूसरी ओर महिला संगठनों व मूल याचिकाकर्ता के वकीलों ने पुनर्विचार याचिकाओं का विरोध किया। इन्द्रा जयसिंह ने कहा कि भगवान महिला पुरुष के साथ कोई भेद नहीं करते। केरल सरकार के वकील ने भी फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि महिलाओं के मंदिर में प्रवेश न देना हिन्दू धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं है। बहुत से अयैप्पा मंदिरों में महिलाएं जाती हैं। धर्म के अभिन्न हिस्से और मंदिर के रीतिरिवाज के अभिन्न हिस्से में अंतर है। हालांकि उन्होंने माना कि फैसले के बाद सामाजिक शांति भंग हुई थी लेकिन कहा कि यह फैसले के पुनर्विचार का आधार नहीं हो सकती।

Source:Agency

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