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एपेक को मिला ट्रेड वॉर का दंड

By Outcome.c :24-11-2018 09:00


आज एपेक विश्व के सर्वाधिक आर्थिक शाक्तिशाली देशों में से एक है और शायद हाल की घटना को देखते हुए कमजोर भी। इस संगठन का हिस्सा फिलहाल भारत नहीं है मगर रूस समेत कई देश जिसमें अमेरिका की भी यह कोशिश है कि भारत इसका सदस्य बने। इसके संगठन की स्थापना के लक्ष्यों में अमेरिका जैसे देश सफल तो हुए पर उत्पन्न मतभेद को रोक पाने में असफल भी हुए। हालांकि एकमात्र घटना से एपेक को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि यह आसियान व नाफ्टा के बीच सम्पर्क सूत्र का काम कर रहा है। भारत का एपेक का सदस्य बनना भारत एवं एपेक दोनों के हित में है। एपेक के अधिकांश सदस्यों के साथ भारत के सम्बंध मजबूत हैं हालांकि चीन के बारे में ऐसा कहना पूरी तरह तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। भारत आसियान के साथ शिखर बैठक 2002 से 'आसियान+1' प्रारूप के तहत काम कर रहा है। साथ में औरों के साथ मजबूत सम्बंध कायम किये हुए हैं।

पिछले कई महीनों से अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर जारी है जिसका साइड इफेक्ट बीते 18 नवम्बर को एपेक सम्मेलन में देखने को मिला। इतना ही नहीं जुबानी जंग के चलते एशिया-प्रशान्त आर्थिक सहयोग संगठन यानी एपेक सम्मेलन इस तनातनी के बीच असफल भी हो गया। गौरतलब है कि पॉपुआ न्यू गिनी में चल रहे एपेक के सम्मेलन में 21 देशों के नेता भी मतभेद को दूर करने में सफल नहीं रहे बल्कि इन दोनों देशों के चलते आपसी तनातनी भी इनके बीच में भी देखी जा सकती है। इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अमेरिका और चीन के चलते सम्मेलन में प्रस्तावित औपचारिक घोशणा भी नहीं हो पायी और खबर तो यह भी है कि चीन के अधिकारियों ने बीते 17 नवम्बर को पापुआ न्यू गिनी के विदेश मंत्री के कार्यालय में घुसने का प्रयास किया इसके बाद पुलिस बल को भी बुलाया गया।

उक्त घटना ने इस बात को और पुख्ता कर दिया कि निजी हितों के चलते वैश्विक संगठन अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। खास यह भी है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि क्षेत्रीय बैठक में चीन के अधिकारी हंगामा न किये हों। इससे पहले इसी साल के सितम्बर में एक सम्मेलन के दौरान चीन से माफ ी मांगने को कहा गया था उस समय चीन के अधिकारी इस बात पर बैठक छोड़ कर चले गये थे कि मेजबान ने उनके दूत को अपनी बारी से पहले बोलने की इजाजत नहीं दी। एपेक के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि सदस्य देशों के नेता व्यापार नीति पर गहरे मतभेद के कारण औपचारिक लिखित घोशणा पर भी सहमत नहीं हो पाये और आयोजक पापुआ न्यू गिनी के प्रधानमंत्री को सम्मेलन असफल करार देना पड़ा। आयोजक प्रधानमंत्री ने तो यह भी कहा कि आप जानते हैं दो बड़े दिग्गज कमरे में हैं मैं क्या कर सकता हूं? 

अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों पर अमेरिकी दबाव व प्रभुत्व को नकारा नहीं जा सकता पर चीन से उपजी समस्या के चलते यहां उसकी हेकड़ी भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती। पहली बार पापुआ न्यू गिनी में हुए इस वार्शिक सम्मेलन में मामला ढाक-के-तीन पात रहा। तो क्या चीन को एपेक की सदस्यता से बाहर कर देना चाहिए। जो अपने स्वार्थ और अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए कहीं भी अनाप-शनाप के लिए उतारू हो जाता है।

हालांकि ताली एक हाथ से नहीं बजती यहां अमेरिका को पूरी तरह क्लीन चिट नहीं दिया जा सकता। वैसे चीन एक बुरी आदत से भी जूझ रहा है वह यह कि पड़ोसी देशों को न चुकाये जा सकने वाले कर्ज भी खूब थोप रहा है। एपेक के इतिहास को देखें तो यह एशिया-पेसिफिक इकोनॉमिक कारपोरेशन मुख्य व्यापार में विश्व की कुछ सबसे शक्तिषाली अर्थव्यवस्थाओं को संयुक्त करता है। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री बॉबहॉक की पहल पर 1989 में इसका गठन हुआ था जिसमें ऑस्ट्रेलिया, पापुआ न्यू गिनी, पेरू, फिलिपीन्स, रूस, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, ताइवान, चीन, अमेरिका तथा वियतनाम सहित 21 देश हैं। इसका मूल उद्देश्य अमेरिका को दक्षिण पूर्व एशियाई देशों विशेषकर एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशन (आसियान) देशों से जोड़ना था।

गौरतलब है आसियान 1967 में गठित दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का संगठन हैं जिसमें 10 सदस्य हैं। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में चीजें बहुत बदलती हुई दिखती हैं पर वे कितनी प्रासंगिक है यह विचार का विषय है। आसियान देशों से जोड़ने के फिराक में गठित एपेक अपने निजी महत्वाकांक्षा के चलते कठिन दौर से गुजर रहा है। दक्षिण एशिया का सार्क, यूरोप का यूरोपीय संघ तथा अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको को मिलाकर बने नाफ्टा के अलावा कई ऐसे क्षेत्रीय संगठन मिल जायेंगे जो आज अपने उद्देश्यों को लेकर कुछ हद तक संघर्ष कर रहे हैं। एपेक से बिगड़ी बात कहां जाकर ठहरेगी इसे अभी कह पाना कठिन है पर ऐसी बातों का वैश्विक पटल पर बड़े नुकसान होते हैं। आपसी एकजुटता के लिए बने देश जब बिखरते हैं तो कई दूसरे देशों पर भी प्रभाव छोड़ते हैं। अमेरिका और चीन ने जहां एक-दूसरे पर सीधा निशाना साधा है वहीं अन्य देश इससे बंटे दिखते हैं जो कहीं से उचित नहीं कहा जा सकता। 

खास यह भी है कि आज एपेक विश्व के सर्वाधिक आर्थिक शाक्तिशाली देशों में से एक है और शायद हाल की घटना को देखते हुए कमजोर भी। इस संगठन का हिस्सा फिलहाल भारत नहीं है मगर रूस समेत कई देश जिसमें अमेरिका की भी यह कोशिश है कि भारत इसका सदस्य बने। इसके संगठन की स्थापना के लक्ष्यों में अमेरिका जैसे देश सफल तो हुए पर उत्पन्न मतभेद को रोक पाने में असफल भी हुए। हालांकि एकमात्र घटना से एपेक को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि यह आसियान व नाफ्टा के बीच सम्पर्क सूत्र का काम कर रहा है।

भारत का एपेक का सदस्य बनना भारत एवं एपेक दोनों के हित में है। एपेक के अधिकांश सदस्यों के साथ भारत के सम्बंध मजबूत हैं हालांकि चीन के बारे में ऐसा कहना पूरी तरह तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। भारत आसियान के साथ शिखर बैठक 2002 से 'आसियान+1' प्रारूप के तहत काम कर रहा है। साथ में औरों के साथ मजबूत सम्बंध कायम किये हुए हैं। साल 2007 में जापानी प्रधानमंत्री शिंजो एबे के चतुष्कोण नीति भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका इसके पुख्ता प्रमाण हैं। इसी को देखते हुए 2010 में ही लगा था कि यदि कोई नया सदस्य एपेक में आयेगा तो भारत पहले नम्बर पर होगा पर यह अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। गौरतलब है कि पापुआ न्यू गिनी में जो हुआ वह आगे के सम्मेलनों के लिए एक मंथन का विषय होगा।

वैश्विक फलक पर चीन स्वयं को एक ध्रुव के रूप में उभारने की फिराक में है जबकि अमेरिका इससे अनभिज्ञ नहीं है। अमेरिका और चीन के बीच रंजिश केवल ट्रेड वॉर ही नहीं है बल्कि दक्षिण-चीन सागर में चीन के प्रभुत्व को लेकर अमेरिका से चल रही अनबन भी है। गौरतलब है कि भारत का 40 फीसदी व्यापार दक्षिण-चीन सागर से होकर गुजरता है और इस सागर में चीन की प्रभुत्व से भारत भी काफी हद तक चिंतित रहता है। भारत, जापान और अमेरिका मिलकर दक्षिण-चीन सागन में पहले युद्धाभ्यास कर चुके हैं जिसका मलाल आज भी चीन को रहता है। फि लहाल भारत एपेक में शामिल होकर एक ओर इस संगठन से सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करेगा तो दूसरी ओर एपेक के माध्यम से उत्तर-दक्षिण संवाद को बढ़ावा देकर न्याय एवं समानता पर आधारित नई अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना कर पायेगा। वैसे भी भारत पूरब की ओर देखों नीति पर तेजी से अमल कर रहा है जो 1990 से लगातार जारी है। फि लहाल बेनतीजा रही एपेक की इस बैठक ने कई सवालों को अपने पीछे छोड़ दिया है।

शक्तिशाली देश के तौर पर जब कई एक साथ होते हैं तो संरक्षणवाद से लेकर व्यक्तिवाद की स्थिति भी व्याप्त हो सकती है। हालांकि चेक बुक कूटनीति की राह पर भी कई हैं। कई छुपे एजेण्डे के तहत ऐसे मंचों पर काम करते हैं। अमेरिका पर भी यह आरोप है कि वह लगातार संकीर्ण होता जा रहा है और ऐसे संगठनों पर ऐसे विचारों का दृष्प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ेगा ही। ऐसे में बड़ा सवाल यह रहेगा कि आगे जब भी बड़े उद्देश्यों से जुड़े अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन हों तो देश निजी महत्वाकांक्षा के बजाय बड़े मन के साथ व्यवहार करें पर शायद यह आदर्श रूप न ले पाये। फि लहाल यूएस और चीन के बीच तनातनी से पापुआ न्यू गिनी में जो हुआ वह सभी के लिए सबक है और सही सोच के साथ आगे बढ़ने का अवसर भी। 

Source:Agency

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