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झाबुअा में मनेगा गाय गोहरी पर्व, गायों के नीचे लेटकर उतारेंगे मन्नत

By Outcome.c :08-11-2018 08:30


झाबुआ। आदिवासी परंपरागत पर्व गाय गोहरी गुरुवार को मनाया जाएगा। शहर में सबसे बड़ा आयोजन होगा। यहां गोवर्धननाथ मंदिर के सामने गाय गोहरी होगी। मंदिर की सात बार परिक्रमा की जाएगी। झाबुआ के अलावा जिले में लगभग 30 स्थानों पर छोटे या बड़े स्तर पर गाय गोहरी आयोजित होगी। आयोजन के लिए प्रशासन और पुलिस ने अपनी ओर से पुख्ता इंतजाम किए हैं।

झाबुआ की पहचान अपनी पारंपरिक संस्कृति से है। वर्षों से यहां अनेक पर्व पूरी परंपरा के साथ मनाए जाते हैं। स्थानीय गोवर्धननाथ मंदिर पर गुरुवार दोपहर 4 बजे के लगभग गाय गौहरी पर्व मनना प्रारंभ होगा। आयोजन स्थल पर दोपहर 2-3 बजे से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाएगा। इसके बाद आजाद चौक पर नगर पालिका द्वारा ग्वालों का सम्मान किया जाएगा।

इस पर्व को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। आकर्षक पर्वो की सूची में प्रमुखता से गाय गौहरी पर्व का अपना एक अलग ही स्थान है। गाय यानी जगत की पालनहार और गोहरी का सीधा अर्थ है ग्वाला। गाय व ग्वाले के आत्मीय संबंध की ही गाय गौहरी पर्व पर अभिव्यक्ति होती है।

गोवर्धन पूजा के दिन गायों का विशेष श्रृंगार करना, फिर उन्हें सजा-धजाकर श्री ठाकुरजी के दरबार में लाना, गोवर्धननाथ मंदिर की सात परिक्रमा, मन्नतधारियों का गायों के झूंड के आगे लेटना और गौमाता की वर्षभर देखभाल करने वाले ग्वालों का सार्वजनिक सम्मान व गोवर्धननाथ की धूमधाम से पूजा-अर्चना ही गाय गौहरी पर्व मनाने के तरीके है।

इसमें संस्कृति का प्रदर्शन भी सहज रूप से होता है। इस दौरान बड़ी संख्या में जनता स्थानीय गोवर्धनाथ मंदिर पर एकत्रित होती है। हिन्दू मान्यता के अनुसार इस दिन नए वर्ष का आगमन होता है और गाय गौहरी पर्व की पृष्ठभूमि में ही नवीन वर्ष शुभ रहने की मंगल कामनाएं व उसका धार्मिक दृष्टिकोण से स्वागत करने की संभावनाएं अंतरमनों में व्याप्त रहती है। गाय गोहरी धूमधाम से मनाएं जाने का इतिहास राजाओं के जमाने से मिलता है। समय की रफ्तार के साथ चाहे उसे मनाने के तरीके बदले हो, किंतु आयोजन के प्रति उत्साह तथा भावनाओं में आज भी कही कोई कमी नही है।

इंसान पर से गायें गुजरती है

वरिष्ठ नागरिक भगवतिलाल शाह का कहना हैं कि कई लोग इस पर्व के दौरान अपनी श्रद्धा अनुसार परिक्रमाओं में गायों के आगे लेटने की मन्नात लेते है, इसे ग्वालों का प्रायश्चित भी माना जाता है। उनके अनुसार ग्वाला ना चाहते हुए भी वर्षभर के दौरान गाय के साथ सख्ती करने को विवश होता है, लेकिन वे गाय को अपनी माता के रूप में मानते है। इसलिए प्रायश्चित के रूप में उनके झुंड के आगे लेटते है। साथ ही वे नए वर्ष की मंगल कामना भी करते है।

इस दिन पशुधन को नहलाकर और तेल मालिश करके तैयार किया जाता है। बदन एवं सींगों को रंग दिया जाता है। जिन व्यक्तियों के शरीर में सत आता है, वे जमीन पर पेट के बल लेट जाते हैं और गायें लेटे हुए इन आदिवासियों के शरीर को स्पर्श करती हुई गुजर जाती है।

मान्यताओं के अनुसार शहरों में गोवर्धन पूजा तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक किगाय गोबर से बने गोवर्धन पर पैर रखकर नहीं गुजरे। आदिवासी अंचल में गोबर की बजाए जीते-जागते इंसान जमीन पर लेटते है और गायें बगैर कोई गंभीर क्षति पहुंचाए इन पर से गुजर जाती है।

Source:Agency

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