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संसार का सर्वश्रेष्ठ पद

By Outcome.c :30-10-2018 09:24


संसार का सर्वश्रेष्ठ पद है माता-पिता का। संतान पैदा करना आसान है। माता-पिता के पद की गरिमा का परिपालन करना बड़ा कठिन है। एक मामूली चौकीदार-चपरासी पद के लिए योग्यता चाहिए।

मां और पिता का पद हम यूं ही चलता कर लेते हैं। यह बात तो तय हो चुकी है कि असली संस्कार मां के ही गर्भ में पड़ते हैं। अभिमन्यु, प्रहलाद, सुकदेव, वशिष्ठ, हनुमान तथा कृष्ण इसके उदाहरण हैं।
योग्य माता-पिता कुशल परिवार पैदा करते हैं। कुशल परिवार के लिए सार्थक और संवेदनशील समाज की जरूरत होती है। ऐसा समाज धर्म नियोजित करता है। कहते हैं चौरासी लाख योनियों में धर्म, केवल मनुष्य के लिए है और किसी के लिए नहीं। देवताओं को भी धर्म संयोग का लाभ नहीं मिला।

ऐसा क्यों हुआ? मनुष्यों के समाज में और पशु-पक्षियों के समाज में ज्यादा अंतर नहीं है। हम कहेंगे कि पशु चौपाया होते हैं। आदमी दो पाया होता है। यह मजेदार भ्रम है। हम भी चौपाएं हैं। आदमी जब दायां पैर आगे बढ़ाता है तो बायां हाथ स्वभावत: आगे आ जाता है।

बायें पांव के साथ ही दाहिना हाथ अपने आप सामने झूल जाएगा। आप जितनी जल्दी चलोगे, दोनों हाथ उतनी तीव्रता से डोलने लगता है। दोनों हाथ बांध दिए तो दौड़ सकना अत्यन्त कठिन होगा।

शरीर का भार पांव ढोता है। हाथ क्यों सक्रिय हो उठते हैं। हम भी चार इन्द्रियों के सहारे चलते हैं। मनुष्य के समाज में मुक्ति, मोक्ष, स्वर्ग आदि हैं। इसलिए वह सीना तान कर चलता है।

पशुओं में यह सब नहीं है, इसलिए वह सर झुकाकर चलता है। हम खाते-पीते हैं। पशु भी खाते-पीते हैं। मनुष्य के समाज में जन्म-मरण है। पशु-पक्षियों भी उसके वर्तुल में हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह यह तमाम विकार मनुष्यों की तरह पशु-पक्षियों में भी है। उन्हें भी सुख-दुख और पीड़ा होती है।

जब सब समान है तब धर्म, पशु-पक्षियों के लिए धर्म क्यों नहीं है? यदि सूक्ष्मता से समझा जाए तो बहुत फर्क है। मनुष्यों और पशु-पक्षियों में।
दोनों का लक्ष्य एक
 धर्म और दर्शन दोनों के लक्ष्य एक है। दोनों ही यह समझाने की कोशिश करते हैं कि विश्व का स्वरूप क्या है और उसमें मनुष्यों का स्थान, कार्य, तथा लक्ष्य क्या है?

दोनों ही यह जानना चाहते हैं कि विश्व की सामान्य रचना का तत्व क्या है? धर्म के अंदर कई बातें आती हैं, जैसे किसी अतिमानवीय शक्ति या शक्तियों के प्रति विश्वास, जो कि मनुष्य को उसके नियत लक्ष्य की ओर ले जाती है, उसके प्रति अत्याधिक आदर, पूजा, पे्रम, भक्ति की भावनाओं से प्रेरित व्यवहार है। संसार के जो बड़े-बड़े धर्म हैं, उनकी उत्पत्ति मनुष्य के विश्व के स्वरूप को समझने और उससे अपना संबंध जानने के प्रयत्न से हुई है।

वे ऐसे विचारों, भावों और विश्वासों को अपनाने और ऐसे व्यवहार की कोशिशें हैं। जैसे मनुष्य की विश्व में स्थिति के अनुसार होना चाहिए। धर्म और दर्शन में किन्तु अंतर है।

धर्म करीब-करीब एक भावना है और व्यवहारिक अनुभव की चीज है। लेकिन दर्शन तार्किक चिंतन मनन की बात है। धर्म में हम अपने आराध्य देव से साधार्म्य स्थापित करते हैं और तल्लीन रहते हैं। दर्शन में हम आध्यात्मिक तल्लीनता के एक रास्ता को तोड़कर उसे विवेचनात्मक विचार का विषय बना देते हैं। धर्म श्रद्धा, पूजा और आनंद की बात है।

दर्शन शुष्क और निष्पक्ष विचार तथा आलोचनात्मक परीक्षा की बात है। विभिन्न धर्मों में जो ज्ञान अंश होता है वह अस्पष्टरूपक प्रधान तंत्रबद्ध और अपूर्ण होता है, जबकि दार्शनिक ज्ञान स्पष्ट तर्क प्रधान और तंत्रबद्ध होता है। यह सत्य है कि धर्म और दर्शन की विष्य वस्तुएं एक ही हैं।

लेकिन प्रत्येक में उन वस्तुओं के प्रति मनुष्य की अभिवृत्ति अलग-अलग है, धर्म में वे वस्तुएं मनुष्य के सामने अपरोक्ष रूप से भक्ति या आध्यात्मिक आनंद के विषय के रूप में आती है। दर्शन चिंतन व अथवा बौद्धिक उपलब्धि का विषय होती है। 

Source:Agency

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