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भाजपा कार्यकारिणी: काठ की हांडी कितनी बार?

By Outcome.c :11-09-2018 08:58


भाजपा ने 2019 के आम चुनाव के लिए और जाहिर है कि इस साल के आखिर में होने वाले तेलंगाना समेत अब पांच राज्यों के विधानसभाई चुनाव के लिए, अपना नारा खोज लिया है? पक्के तौर पर कहना मुश्किल है। पर इतना पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि भाजपा ने अगले चुनाव के लिए अपना चेहरा भर नहीं बल्कि अपना इकलौता नेता खोज लिया है। यह कोई संयोग ही नहीं है कि ''अजेय भारत, अटल भाजपा’’ का इस पार्टी का नया नारा भी, भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की नई-दिल्ली में हुई दो-दिन बैठक के आखिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में ही दिया गया। ऐसा लगता है कि यह इस नारे के प्रस्तुत किए जाने का ही नहीं, उससे कुछ ज्यादा का मामला था। भाजपा कार्यकारिणी की बैठक से ऐन पहले और भाजपायी मुख्यमंत्रियों व राज्य अध्यक्षों आदि के साथ अपनी बैठक के बाद, अमित शाह ने कुछ भिन्न रूप में यह नारा पेश किया था, जिसमें भारत की जगह, भाजपा के ही अजेय होने का ऐलान था। लेकिन, नरेंद्र मोदी द्वारा पेश किए जाने तक, यह नारा बदल चुका था और भाजपा की जगह, भारत की अजेयता का ऐलान ले चुका था। बेशक, यह मानना तो मुश्किल है कि सत्ताधारी पार्टी के 'अजेयता’ के ऐसे दावे से झलकने वाले अहंकार के संकोच से यह बदलाव किया गया होगा और नरेंद्र मोदी ने हस्तक्षेप कर के यह बदलाव कराया होगा। इसके बजाए, इसी की संभावना ज्यादा है कि चुनाव से पहले और खासतौर पर तेलंगाना समेत चार बड़े राज्यों के अपने लिए काफी कठिन विधानसभाई चुनावों की पूर्व-संध्या में, भाजपा की जीत के ऐसे अहंकारपूर्ण दावे से मतदाताओं के चिढ़ सकने के खतरे ने ही, सत्ताधारी पार्टी को अपनी अजेयता का दावा करने से रोक दिया।

               लेकिन, भाजपा की 'अजेयता’ घोषणा करने से संकोच किए जाने का अर्थ यह हर्गिज नहीं है कि भाजपा की राष्टï्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कोई कम अहंकार देखने को मिला है। यह अहंकार सिर्फ विपक्ष पर सड़कछाप हमलों तक ही सीमित नहीं था, जो खुद प्रधानमंत्री की पहचान ही बन गये हैं। खैर, इस पर हम जरा बाद में चर्चा करेंगे। यह अहंकार इस तरह की शेखी तक भी जाता है कि 2019 का चुनाव तो भाजपा जीतेगी ही जीतेगी और 2014 के चुनाव से भी बड़े बहुमत से जीतेगी। और उसने एक बार 2019 का चुनाव जीत लिया, उसके बाद पचास साल तक कोई उसे हिला नहीं पाएगा। यह दूसरी बात है कि ऐसी शेखियों कोई उचित ही कोई भी गंभीरता से नहीं लेता है। फिर भी मोदी-शाह के नेतृत्व में भाजपा ने, ऐसी शेखी मारने तथा हवाई दावे करने को, अपने प्रचार का एक प्रमुख हथियार ही बना लिया है। इस मामले में सत्ताधारी पार्टी गोयबल्स की सुयोग्य शिष्य नजर आती है। जाहिर है कि इस तरह के दावे यही मानकर किए जाते हैं कि नासमझ जनता को तो, कुछ भी समझाया जा सकता है। इसीलिए, हालांकि गुजरात से लेकर कर्नाटक तक, एक के बाद एक सभी महत्वपूर्ण चुनावों में नतीजों के जरिए जनता ने अमित शाह के अतिरंजित दावों को साफ तौर पर नकारा है, इसके बावजूद भाजपा अध्यक्ष को बार-बार ऐसे दावे करने में कोई संकोच नहीं होता है। वह तो बेधड़क उत्तर प्रदेश में भी पिछली बार की 72 से दो सीट फालतू जीतने के दावे करते फिरते हैं, जबकि सचाई यह है कि इस राज्य में उपचुनाव में लोकसभा की तीन में से तीनों सीटें हारकर भाजपा, सीटों के पिछली बार के आंकड़े में तीन की कमी तो पहले ही कर चुकी है।

               लेकिन, भाजपा खुद ही तब अपनी इन दंर्पोक्तियों की पोल खोल देती है, जब मोदी-शाह की जोड़ी अपने आम तरीके के अनुरूप अपना पूरा ध्यान, विपक्ष पर अक्सर निराधार हमले करने में ही लगाए नजर आती है। महत्वपूर्ण चुनावों की पूर्व-संध्या में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की ताजा बैठक में भी ठीक यही हुआ। 2014 से भी बड़े बहुमत से जीतने, नौ करोड़ कार्यकर्ताओं तथा योजनाओं के लाभों के सहारे तेतीस-चौंतीस करोड़ मतदाताओं को अपने पीछे लेने, नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता रेटिंग चार साल बाद भी 70 फीसद से ऊपर बनी रहने, कांग्रेस के शासन के 48 साल का मुकाबला मोदी के राज के 48 महीने से करने, आदि की तमाम डींगें हांकने के बावजूद, पूरी बैठक की चर्चा यही दिखाने पर केंद्रित थी कि विपक्ष के पास कोई 'नेता, नीति और नीयत ही नहीं है’। वह तो सिर्फ नरेंद्र मोदी को ''रोकना’’ चाहता है! यह दिलचस्प है कि हालांकि अमित शाह के अपने आरंभिक अध्यक्षीय भाषण में ही विपक्षी एकता के प्रयासों को, भाजपा के हिसाब से बिल्कुल बेमानी करार देकर खारिज कर दिया था, इसके बावजूद मोदी ने बैठक के दूसरे दिन के अपने संबोधन में अपना ज्यादा समय विपक्षी गठबंधन के विचार पर हमला करने में ही लगाया। आखिर, क्यों? क्योंकि मोदी-शाह जोड़ी बखूबी जानती है कि अगले चुनाव की तो बात ही क्या करना, 2014 के आम चुनाव में भाजपा की प्रकटत: ''जबर्दस्त जीत’’ भी, एक-तिहाई से कम वोट पर टिकी हुई थी यानी दो-तिहाई वोट भाजपा के खिलाफ पड़े थे। इस वोट का एक हद तक एकजुट होना भी, मोदी के राज के खिलाफ आम जनता के सभी हिस्सों के बीच तेजी से बढ़ते असंतोष के साथ जुड़कर, आसानी से चुनाव की बाजी पलट सकता है। इसीलिए, चुनाव में कोई मुकाबले में ही नहीं होने की सारी शेखी अपनी जगह, मोदी-शाह जोड़ी विपक्ष को एकजुट करने के प्रयासों पर हमले करने, उन्हें अनैतिक बताकर बदनाम करने, पर ही अपनी सबसे ज्यादा ऊर्जा लगाती है।

               अचरज नहीं है कि इस क्रम में भाजपा बार-बार, अपने तानाशाही के मिजाज के ही सबूत देती है। ऐसा ही एक और सबूत पेश करते हुए, भाजपा की कार्यकारिणी की बैठक में, संसद के पिछले सत्र में आए अविश्वास प्रस्ताव से मोदी सरकार के बचे रह जाने का ढोल ही नहीं पीटा गया बल्कि विपक्ष के मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखने पर ही हमला किया गया। वास्तव में भाजपा की राष्टï्रीय कार्यकारिणी के हिसाब से तो विपक्ष के पास बहुमत न होने के बावजूद, अविश्वास प्रस्ताव का विचार के लिए स्वीकार किया जाना ही, विपक्ष के प्रति मोदी सरकार की भारी 'उदारता’ का सबूत था! लेकिन भाजपा से, जो मोदी सरकार के हर तरह के विरोध को ही 'अपराध’ बना देने पर तुली हुई है, ऐसे तानाशाहीपूर्ण रुख के सिवा और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? लेकिन, जनतांत्रिक व्यवस्था में थोड़ा सा भी विश्वास रखने वाला हरेक व्यक्ति यह जानता है कि अविश्वास प्रस्ताव, सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने और उसके खिलाफ विरोध दर्ज कराने का, एक सर्वस्वीकार्य व काफी आम-फहम हथियार है। मोदी सरकार के खिलाफ चार साल बाद पहले अविश्वास प्रस्ताव को भी सत्ताधारी पार्टी का हजम न कर पाना, उसके जनतंत्रविरोधी मिजाज को ही दिखाता है।

               लेकिन, यह मामला आम जनतंत्रविरोधी मिजाज का ही नहीं है। यह एक सुप्रीमो की अंध-भक्ति से संचालित जनतंत्रविरोधी मिजाज का मामला है। यह दिलचस्प है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने खुद ही यह कहकर नरेंद्र मोदी को अपनी पार्टी के निरंकुश नेता के आसन पर बैठा दिया कि पूर्व-प्रधानमंंत्री, 'मनमोहन सिंह पार्टी के पीछे चलते थे, नरेंद्र मोदी के पीछे पार्टी चलती है।’ याद रहे कि भाजपा, जो वैसे भी इस अर्थ में एक सामान्य जनतांत्रिक राजनीतिक पार्टी है ही नहीं कि वह तो अंतत: बाहर से, आरएसएस से संचालित पार्टी है, जो एक नेता के सिद्घांत पर चलता है। बहरहाल, वह अब तो न्यूनतम जनतांत्रिक सिद्घांत पर ही हमला करती नजर आती है कि अपने सदस्य समूह की इच्छा की अभिव्यक्ति के रूप में कोई भी राजनीतिक पार्टी, अपने बड़े से बड़े नेता से भी ऊपर होती है और होनी भी चाहिए। अचरज नहीं कि ऐसी पार्टी के सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय की बैठक में पैट्रोल के दिनों-दिन बढ़ते दाम, रुपए के दिन पर दिन गिरते दाम आदि से लेकर तेजी से बढ़ती बेरोजगारी, भीड़ हत्याओं, अल्पसंख्यकों व दलितों पर बढ़ते हमलों, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचारों तक, सरकार और देश के सामने खड़ी किसी भी चुनौती पर विचार तक करने की जरूरत नहीं समझी गयी। यहां तक कि इसकी कोई सफाई देने की भी जरूरत नहीं समझी गयी कि 'अच्छे दिन आएंंगे’ के नारे को भुलाकर अब, 2022 तक 'न्यू इंडिया’ बनाएंगे का नया नारा क्यों देना पड़ रहा है? हां! ऐसे हरेक सवाल का एक ही जवाब सिखाया गया—पिछली सरकारों ने क्या किया था? भाजपा, पैसे और मीडिया की ताकत के बल पर और 'न्यू इंडिया’ के झूठे दिलासों के सहारे, जनमत को किसी न किसी तिकड़म से मैनिपुलेट करने के ही भरोसे है। पर काठ की हांडी बार-बार थोड़े ही चढ़ती है।
 

Source:Agency

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