Breaking News

आतंकवाद के खिलाफ ब्रिक्स

By Outcome.c :11-08-2018 09:00


कहना गलत नहीं होगा कि ब्रिक्स देशों के पास प्रचुर मात्रा में संसाधन है जिससे वे एकदूसरे का सहयोग कर आर्थिक विकास को नई दिशा दे सकते हैं। चीन विनिर्माण के क्षेत्र में दुनिया में अव्वल है। दुनिया उसकी टेक्नालाजी की कायल है। रुस के पास उर्जा का असीमित भण्डार है। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वह सिरमौर है। ब्राजील कृषि क्षेत्र का महाशक्ति कहा जाता है। भारत कृषि और आईटी दोनों में तेजी से विकास कर रहा है। दक्षिण अफ्रीका प्राकृतिक संसाधनों से लैस है। यह स्थिति ब्रिक्स देशों को मजबूत बनाता है। अगर ब्रिक्स देश आपसी सहयोग दिखाते हैं तो इन देशों में पसरी गरीबी, भूखमरी और कुपोषण जैसी समस्याओं से निपटने में आसानी होगी और वैश्विक राजनीति में उनकी भागीदारी सशक्त होगी। उम्मीद जताया जा रहा है कि 2050 तक ब्रिक्स देशों की स्थिति और अधिक मजबूत होगी।

उभरती विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के सशक्त समूह ब्रिक्स का दसवां शिखर सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग शहर में संपन्न हो गया। चूंकि इस शिखर सम्मेलन का विषय 'ब्रिक्स इन अफ्रीका-कोलब्रेशन फॉर इनक्लुसिव ग्रोथ एंड शेयर्ड प्रॉसपिरिटी इन द फोर्थ इंडस्ट्रियल रिवोलेशन था, लिहाजा इस संदर्भ को ध्यान में रखकर ही सदस्य देशों ने विमर्श को आयाम दिया। शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने एक स्वर में एकतरफावाद को खारिज करते हुए नियम-आधारित विश्व व्यवस्था गढ़ने, बहुपक्षीय संस्थानों को सुदृढ़ता प्रदान करने और अंतर-व्यापार को मजबूती देने के साथ जोहान्सबर्ग घोषणापत्र को मूर्त रुप देने की प्रतिबद्धता जाहिर की है। ब्रिक्स घोषणापत्र में कट्टरपंथ से निपटना, आतंकवादियों के वित्त पोषण के माध्यमों को अवरुद्ध करना, आतंकी शिविरों को तबाह करना और आतंकी संगठनों द्वारा इंटरनेट के दुरुपयोग को रोकना मुख्य रुप से शामिल है। ब्रिक्स देशों के बीच स्पष्ट रुप से सहमति बनी कि आतंकी कृत्यों को अंजाम देने वाले और उन्हें मदद देने वालों को निश्चित रुप से जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे आतंकवाद के मुद्दे को गंभीरता से उठाया और साथ ही प्रौद्योगिकी के महत्व, कौशल विकास और प्रभावी बहुपक्षीय सहयोग पर सदस्य देशों के साथ अपने विचार साझा किए।

 गौर करें तो ब्रिक्स देशों द्वारा जारी घोषणापत्र में आतंकवाद से निपटने के लिए एक समग्र रुख पर हामी भारत के लिए बड़ी उपलब्धि है। इसलिए और भी कि भारत द्वारा आतंकवाद को खत्म करने के लिए वैश्विक मंचों से लगातार आवाज उठाया जा रहा है। याद होगा चीन के शियामेन शहर में संपन्न नौंवे शिखर सम्मेलन में भी भारत ने आतंकवाद का मसला जोर-शोर से उठाया था और उसके कहने पर ही पाकिस्तान पोषित आतंकवादी संगठनों जैश-ए-मोहम्मद, हक्कानी नेटवर्क और तालिबान पर नकेल कसने की सहमति बनी। इसी तरह गोवा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भी प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स देशों से आह्नान किया था कि वे संयुक्त राष्ट्र के 'कंप्रिहेंसिव कनवेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्मÓ (सीसीआईटी) के जल्द अनुमोदन के लिए मिलकर काम करें ताकि आतंकवाद का मुकाबला किया जा सके।

भारत के आह्नान पर ही ब्रिक्स सदस्य देशों ने आतंकवाद से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी गठबंधन की वकालत की थी। ध्यान देना होगा कि दसवें शिखर सम्मेलन में आतंकवाद से निपटने की चुनौती पर विमर्श के साथ-साथ आर्थिक मसलों पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ। सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच व्यापार-कारोबार क्षेत्र में एक दूसरे की मदद करने, विकास परियोजनाओं का मदद की प्रक्रिया तेज करने, आपसी सहयोग से मौद्रिक नीति को अनुकूल बनाने, प्राकृतिक संपदा का संरक्षण करने तथा पर्यावरण सुरक्षा के प्रति संवेदनशील रुख अपनाने पर सहमति बनी। नि:संदेह इस पहल से ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच आपसी तालमेल बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। ब्रिक्स संगठन की उपलब्धियों और चुनौतियों पर नजर दौड़ाएं तो 2009 में रुस के शहर येकाटेंरिनवर्ग से शुरु हुई यह यात्रा जोहान्सबर्ग सम्मेलन तक उपलब्ध्यिों से भरपूर रही है। चूंकि ब्रिक्स के सदस्य देश आने वाले समय की उभरती हुई शानदार अर्थव्यवस्थाएं हैं और ऐसे में वे चार दशक बाद अमेरिका और यूरोपिय संघ की अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ देते हैं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
 

ब्रिक्स के शिखर सम्मेलनों पर गौर करें तो डरबन शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने आपातकालीन स्थिति में ऋण संकट से उबरने के लिए 100 बिलियन डॉलर का एक आपातकालीन कोष बनाने का सपना देखा और उसे फोर्टलेजा सम्मेलन में साकार कर दिया। इसमें चीन सबसे अधिक 41 अरब डॉलर और दक्षिण अफ्रीका सबसे कम 5 अरब डॉलर दिया। भारत, रुस और ब्राजील सभी 18-18 अरब डॉलर देने की घोषणा की। याद होगा गत वर्ष पहले ब्राजील, रुस और चीन ने घोषणा की कि वे 70 बिलियन डॉलर अर्थात 50 बिलियन यूरो को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा निधि द्वारा निर्गत बहुमुद्रा बांडों में निवेश करेंगे और इस दिशा में पहल तेज है। सदस्य देशों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष में मतदान करने वाली विधि में संरचनात्मक परिवर्तन पर भी जोर दिया जा चुका है। ब्रिक्स सदस्य देशों ने 2012 में दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन के आयोजन से पहले ब्रिक्स अकादमिक फोरम में विकास बैंक बनाने पर विचार किया और दो साल बाद उसे फोर्टलेजा सम्मेलन में मूर्त रुप दिया। यह संशय निराधार साबित हुआ कि चीन अपनी आर्थिक ताकत के बूते विकास बैंक में बड़ी हिस्सेदारी के लिए सदस्य देशों पर दबाव बनाने में कामयाब रहेगा। हालांकि चीन की ऐसी इच्छा रही किंतु भारत ने पहले ही स्पष्ट कर दिया कि सभी देशों की बराबर हिस्सेदारी रहेगी।

 उल्लेखनीय है कि ब्रिक्स देशों के पास विश्व का 25.9 फीसद भू-भाग एवं 40 फीसदी आबादी है। विश्व में सकल घरेलू उत्पाद में इनका योगदान 15 फीसदी है। आंकड़ों पर गौर करें तो विश्व में निरपेक्ष सकल घरेलू उत्पाद में ब्रिक्स देशों चीन, रुस, ब्राजील तथा भारत की स्थिति तीसरा, दसवां एवं बारहवां है। इसमें चीन का सकल घरेलू उत्पाद 4.4 मिलियन, रुस का 1.67 मिलियन, ब्राजील का 1.57 और भारत का 1.2 मिलीयन डॉलर है। अच्छी बात यह है कि ब्रिक्स देशों की आर्थिक ताकत लगातार बढ़ रही है। लेकिन राजनीतिक व कुटनीतिक नजरिए से देखें तो ब्रिक्स वर्तमान मत प्रणाली में ब्रिक्स देशों के मत देने का अधिकार उनकी आर्थिक शक्ति के लिहाज से काफी कम है। लेकिन ब्रिक्स बैंक की स्थापना से वैश्विक अर्थव्यवस्था में उनकी धाक मजबूत होगी। कहना गलत नहीं होगा कि ब्रिक्स देशों के पास प्रचुर मात्रा में संसाधन है जिससे वे एकदूसरे का सहयोग कर आर्थिक विकास को नई दिशा दे सकते हैं।

चीन विनिर्माण के क्षेत्र में दुनिया में अव्वल है। दुनिया उसकी टेक्नालाजी की कायल है। रुस के पास उर्जा का असीमित भण्डार है। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वह सिरमौर है। ब्राजील कृषि क्षेत्र का महाशक्ति कहा जाता है। भारत कृषि और आईटी दोनों में तेजी से विकास कर रहा है। दक्षिण अफ्रीका प्राकृतिक संसाधनों से लैस है। यह स्थिति ब्रिक्स देशों को मजबूत बनाता है। अगर ब्रिक्स देश आपसी सहयोग दिखाते हैं तो इन देशों में पसरी गरीबी, भूखमरी और कुपोषण जैसी समस्याओं से निपटने में आसानी होगी और वैश्विक राजनीति में उनकी भागीदारी सशक्त होगी। उम्मीद जताया जा रहा है कि 2050 तक ब्रिक्स देशों की स्थिति और अधिक मजबूत होगी। चीन 70.71 मिलीयन डॉलर के साथ पहला, भारत 37.66 मिलियन डॉलर के साथ तीसरा, ब्राजील 11.36 मिलियन डॉलर के साथ चैथा और रुस का 8.58 मिलियन डॉलर के साथ छठा पायदान पर होगा। निश्चित रुप से ब्रिक्स ने कम समय में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं लेकिन उसके समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं है। देश-दुनिया के सामने उसके सदस्य देशों का आपसी विवाद जगजाहिर है। अगर इसे दूर नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में ब्रिक्स के समक्ष कई किस्म की समस्याएं पैदा हो सकती हैं। 

भारत के साथ चीन का जटिल सीमा विवाद, डोकलाम विवाद, पाकिस्तान के संदर्भ में उसकी भारत विरोधी नीति और दक्षिण चीन सागर में हाइड्रोकार्बन संपदा के प्रति उसका साम्राज्यवादी रवैया ब्रिक्स के उद्देश्यों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि दोनों देशों के बीच आपसी सहमति से डोकलाम विवाद समाप्त हो चुका है और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति दोनों ही सीमा विवाद सुलझाने के पक्षधर हैं। भारत को चाहिए कि दोनों देशों के बीच मौजूदा व्यापार असंतुलन समाप्त करने के लिए चीन पर दबाव बनाए। हालांकि चीन ने भारत को आश्वासन दे चुका है कि वह इस असंतुलन को दूर करेगा। वैसे भी मौजूदा समय में चीन को आर्थिक महाशक्ति के रुप में उभर रहे भारत की अनदेखी करना आसान नहीं होगा। अच्छी बात यह है कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी ब्रिक्स के अन्य सभी देशों से रिश्ते प्रगाढ़ करने में कामयाब हुए हैं। अमेरिका से निकटता के बावजूद भी रुस और भारत के बीच आपसी सामंजस्य बना हुआ है।

रुस आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का साथ देने की कई बार प्रतिबद्धता जता चुका है। नि:संदेह आतंकवाद पर ब्रिक्स देशों के समान दृष्टिकोण से दक्षिण एशिया में शांति, सहयोग और आर्थिक विकास का वातावरण निर्मित होगा। जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन के महत्व का मूल्यांकन करें तो यह सम्मेलन अतीत में बुने गए सपनों को आकार देने में काफी हद तक सफल रहा है। कहना गलत नहीं होगा कि आतंकवाद पर ब्रिक्स देशों ने एकजुटता बनाए रखने का संकल्प जाहिर कर अपनी भूमिका को एक नया तेवर दिया है। लेकिन ब्रिक्स देशों को अभी एकदूसरे की सहयोग करने की असल चुनौती और अग्निपरीक्षा से गुजरना बाकी है। 
 

Source:Agency

Rashifal