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आम आदमी पर टैक्स

By Outcome.c :02-08-2018 07:12


घाटे में चल रहे सरकारी बैंकों को जीवित रखने के लिए सरकार द्वारा बार-बार उन्हें पूंजी उपलब्ध कराई जा रही है। अनुमान है कि लगभग दो लाख करोड़ की विशाल धन राशि इन्हें पूंजी के लिए कुछ समय में उपलब्ध कराई जायेगी। यह विशाल धन राशि हम आप जैसे सामान्य नागरिकों द्वारा खपत की जा रही वस्तुओं पर जीएसटी वसूल करके बैंकों को उपलब्ध कराई जा रही है। सरकारी बैंकों के खस्ता हाल का खामियाजा आज जनता झेल रही है। 

कहानी की शुरुआत 70 के दशक में इंदिरा गांधी के समय हुई थी। उस समय देश के प्रमुख बैंक निजी क्षेत्र में थे। केवल स्टेट बैंक सरकारी क्षेत्र में था। इंदिरा गांधी ने सोचा कि प्राइवेट बैंकों द्वारा उद्यमियों को ऋण उपलब्ध कराये जा रहे थे जबकि सामान्य नागरिक को ऋण देने में उनकी कोई रुचि नहीं थी। ऐसा सोचकर उन्होंने 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। उनके ऊपर सरकार का स्वामित्व स्थापित हो गया। इसका सुप्रभाव यह पड़ा कि इन बैंकों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में नई शाखायें खोली गईं। ग्रामीण क्षेत्र में बैंकिंग व्यवस्था का विस्तार हुआ और छोटे उद्योगों को इन बैंकों ने ऋण भी दिये। लेकिन साथ-साथ दूसरी समस्या भी उत्पन्न हो गई। इन बैंकों के मुख्य अधिकारी मूलत: सरकारी अधिकारी थे। इनके व्यक्तिगत स्वार्थों तथा बैंक के लाभ के बीच में सीधा रिश्ता नहीं था। सम्भव था कि मुख्य अधिकारी भ्रष्टाचार करके भारी रकम कमाएं और गलत ऋण देकर के बैंक को डुबो दें जैसा कि पंजाब नेशनल बैंक ने माल्या के साथ किया। इन बैंकों द्वारा घटिया ऋण दिये गये और ऋण खटाई में पड़ गए।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य आज उलट चुका है। बैंकों का राष्ट्रीयकरण इसलिए किया गया था कि सामान्य नागरिक को बैंक द्वारा अधिक मात्रा में ऋण दिये जायेंगे जिससे उसकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो। लेकिन आज ठीक इसके उलट हो रहा है। आम आदमी पर टैक्स आरोपित कर इन बैंकों को उपलब्ध कराई जा रही है जिससे कि इनमें व्याप्त भ्रष्टाचार बना रहे। निजी बैंकों के कुएं से निकल करके हम सरकारी बैंकों की खाई में जा गिरे हैं।

इस समस्या की जड़ में रिजर्व बैंक की नौकरशाही की अकुशलता है। रिजर्व बैंक द्वारा सभी सरकारी और निजी बैंकों पर नियंत्रण किया जाता है। रिजर्व बैंक ने व्यवस्था बना रखी है कि सभी बैंकों द्वारा प्राथमिक क्षेत्र जैसे छोटे उद्योग एवं कृषि को निर्धारित मात्रा में ऋण दिये जायेंगे। व्यवस्था बना रखी है कि बैंकों द्वारा जितनी रकम जनता से जमा कराई जाती है उसका एक हिस्सा नकद में रखा जायेगा जिसे कैश रिजर्व रेशियो कहते हैं और दूसरा हिस्सा सरकारी बाण्डों में निवेश किया जायेगा जिसे स्टेट्यूटरी लिक्वीडिटी रेशियो कहते हैं। रिजर्व बैंक के लिए सम्भव था कि जिस प्रकार प्राथमिक क्षेत्रों को ऋण देने के लिए सभी बैंकों को आज बाध्य किया जा रहा है उसी प्रकार सत्तर के दशक में निजी बैंकों को प्राथमिक क्षेत्रों को ऋण देने के लिए बाध्य किया जाता। उसी समय निजी बैंकों को कहा जा सकता था कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाएं खोलें और छोटे उद्यमियों को ऋण दें। रिजर्व बैंक अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वाह करने में सफल नहीं हुआ और इसके कारण हमारी बैंकिंग व्यवस्था केवल अमीरों की रह गई। इंदिरा गांधी ने इस समस्या को ठीक समझा था लेकिन जो उन्होंने हल किया वह उल्टा पड़ा। इंदिरा गांधी को करना यह चाहिये था कि रिजर्व बैंक को आदेश देतीं कि वह सख्ती से निजी बैंकों को ग्रामीण क्षेत्रों में और छोटे उद्यमियों को ऋण देने के लिए कदम उठाए। ऐसा करने के स्थान पर उन्होंने इनका राष्ट्रीयकरण कर दिया और बैंकिंग व्यवस्था की भ्रष्ट नौकरशाही को और शक्तिशाली बना दिया। 

अब हमारे सामने सरकारी बैंकों की अकुशलता का विकराल भूत खड़ा हुआ है। इस समस्या को हल करने के लिए दो कदम उठाने पड़ेंगे। पहला कदम यह कि रिजर्व बैंक की नौकरशाही की जवाबदेही निश्चित हो। उदाहरण के लिए रिजर्व बैंक जवाब दे कि नोटबन्दी के कारण जो अर्थव्यवस्था का नुकसान हुआ उसकी जिम्मेदारी किसकी है। नोटबन्दी से कितनी रकम वसूल की गई और वह नकद अर्थव्यवस्था में वापस क्यों पहुंचाना पड़ा। यदि ऐसा करना पड़ा तो इसकी जवाबदेही निर्धारित करके उन अधिकारियों को बर्खास्त किया जाए जिन्होंने इन कदमों का समर्थन किया था। इसी प्रकार रिजर्व बैंक के अधिकारियों की जवाबदेही निर्धारित होनी चाहिए कि प्राथमिक क्षेत्रों को निर्धारित मात्रा में ऋण क्यों नहीं दिए जा रहे हैं और उन अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिये जिन्होंने प्राथमिक क्षेत्रों को ऋण देने में कमी करने पर सख्त कार्रवाई नहीं की। 

नौकरशाही की अकुशलता की यह समस्या केवल रिजर्व बैंक तक सीमित नहीं है बल्कि यह समस्या सम्पूर्ण सरकारी तंत्र में व्याप्त है। यदि सरकार द्वारा एक अकुशल रिजर्व बैंक के गवर्नर को हटाकर दूसरे कुशल व्यक्ति को नियुक्त कर दिया जाता है तो कुछ समय के लिए सम्भव है कि रिजर्व बैंक सही हो जाए लेकिन व्यवस्था तो वैसे ही पुरानी लचर रहेगी। इसलिए जरूरत है कि रिजर्व बैंक सहित सम्पूर्ण सरकारी नौकरशाही के ढांचागत सुधारों पर सरकार ध्यान दे। 

नौकरशाही के सुधार का पहला बिन्दु यह है कि जनता द्वारा प्रत्येक वरिष्ठ सरकारी कर्मी का गुप्त मूल्यांकन कराया जाये। जैसे सरकारी बैंक के जनरल मैनेजर के विषय में उस बैंक के उपभोक्ताओं का गुप्त सर्वेक्षण कराया जा सकता है। उस बैंक के खातेदारों से पूछा जा सकता है कि उनकी दृष्टि में वर्तमान जनरल मैनेजर कुशल है अथवा अकुशल है। दूसरा बिन्दु यह है कि सरकार को सेंट्रल विजिलेंस कमीशन की तर्ज पर एक 'केन्द्रीय सरकारी कर्मी मूल्यांकन संगठन' स्थापित करना चाहिए। इस संगठन का कार्य हो कि स्वयं इनिशियेटिव लेकर के जितने सरकारी कर्मी हैं उनका गुप्त मूल्यांकन करे। स्वयं जाकर बैंक की शाखाओं में बैठे और समझे कि बैंक की कार्यकुशलता कैसी है। इस गोपनीय मूल्यांकन के आधार पर सरकारी कर्मियों को पदोन्नति दी जाए अथवा उन्हें बर्खास्त किया जाए। तीसरा बिन्दु यह है कि सभी सरकारी कर्मियों के कार्यों का प्रभाव क्या हुआ का आकलन किया जाए। जैसे अपने देश के हर जिले में लीड बैंक होता है। लीड बैंक के जिला के मुख्य अधिकारी का मूल्यांकन इस बिन्दु पर किया जाए उस जिले में लीड बैंक द्वारा छोटे उद्यमियों को दिए गए ऋण में कितनी वृद्धि अथवा कमी आई। जिन अधिकारियों के कार्यकाल में ऋण में कमी हुई है उसकी जांच हो। इस प्रकार के गुप्त मूल्यांकन के आधार पर सरकारी कर्मियों को पदोन्नति देनी चाहिये अथवा बर्खास्त कर देना चाहिये। यह व्यवस्था रिजर्व बैंक में विशेषत: लागू करनी चाहिये। इससे रिजर्व बैंक की कार्यशैली में सुधार आयेगा। साथ-साथ सभी सरकारी बैंकों का निजीकरण कर देना चाहिए जिससे ये बैंक नौकरशाही के भ्रष्टाचार से मुक्त हों जाएं और देश के नागरिक पर दो लाख करोड़ की विशाल राशि वसूल करके इन बैंकों के भ्रष्टाचार को पोषित करने के लिए उपलब्ध कराने की जरूरत न रहे।
 

Source:Agency

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