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क्या मायावती इस बारे में सोचेंगी?

By Outcome.c :09-07-2018 08:14


मायावती के वक्तव्य पर लौटते हुए हम यह देखते हैं कि वे और उनकी पार्टी ने लगभग 2 दशकों तक इस देश में एक मजबूत सरकार का गठन नहीं होने दिया। समाज के सबसे कमजोर और पदाक्रांत वर्गों को जोड़कर उन्होंने उच्च वगो एवं जातियों के वर्चस्व को गम्भीर चुनौती दी। इसके बहुत सारे दूरगामी सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव न•ार आए। उनकी पार्टी ने कांग्रेस के जनाधार को लगातार तोड़ा और खासकर उत्तर प्रदेश में उसके जनाधार को गहरा आघात लगाया जिससे कि वह कभी बहुमत में नहीं आ सकी और क्षेत्रीय और विकेन्द्रीकरण की राजनीति करने वाली शक्तियों को जगह मिली। लेकिन इस प्रक्रिया में उन्हें यह आभास नहीं हुआ कि कांग्रेस को कमजोर करके वे प्रतिक्रियावादी और प्रतिगामी शक्तियों को एक अधिक कठोर तंत्र भाजपा के तरफ  धकेल रही हैं। 

वर्ष 2007 में जब मैंने सिविल सेवाओं की परीक्षा की तैयारी करना शुरू किया तो मेरा परिचय हुआ लोक प्रशासन नाम के एक नए विषय से।  सीधे मेडिकल कॉलेज से आया था और यह एक अनजाना विश्व था, जिसकी चेतना और शब्दावली अपरिचित जान पड़ रही थी। विचित्र से लग रहे, विशेषकर अमरीकी विचारकों के अजीब से सिद्धांतों को समझने की कोशिश कर रहा था जो कि अक्सर ही सामान्यबोध के दुहराने सा प्रतीत हो रहा था और उसे दिव्य अलौकिक ज्ञान सा प्रस्तुत किया जा रहा था। ऐसे में मेरा ध्यान गया समन्वय के सिद्धांतों के अनेक प्रकारों में उल्लेख किये गए एक सिद्धांत हरलन क्लीवलैंड की टेंशन थ्योरी पर जिसके अनुसार, किसी भी संगठन की योजना बनाते समय उसमें अर्न्तसंघर्ष व अधिकार क्षेत्र के टकराव की भी गुंजाइश जाना चाहिए क्योंकि तंत्र यदि अबाधित हुआ तो शीर्ष नेतृत्व तानाशाहीपूर्ण हो जायेगा और तुरंत ही मुझे आभास हुआ कि यह बात तो मैंने पहले भी सुनी थी मगर कहां?  

9 वर्ष पहले स्कूल से निकलते समय मेरी आकांक्षाओं की सीमा प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित थी और राजनीति या समाज की कोई विशेष समझ का भी अभाव था और राजनीति केवल बड़ों की बातचीत का विषय था। वह 1998 का वर्ष था। सिर्फ  दो सालों के बाद देश को दोबारा मध्यावधि चुनावों का सामना करना पड़  रहा था और सारी चर्चा इसी बात पर केंद्रित थी कि देश को एक स्थायी और मजबूत सरकार की जरूरत थी। दोनों बड़े राष्ट्रीय दल कांग्रेस और भाजपा इसी बात का प्रचार कर रहे थे। ऐसे में मैंने सुश्री मायावती को  एक दिन टेलीवि•ान पर बोलते सुना कि उनकी इच्छा है कि जब तक बहुजन समाज और उनकी प्रतिनिधि बसपा अपने दम पर सरकार बनाने में सक्षम नहीं हो जाती तब तक केंद्र में एक कमजोर सरकार ही बननी चाहिए क्योंकि यदि एक मजबूत सरकार बनेगी तो वह बहुजनों का नुकसान करेगी। और इसके लिए अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ेंगे ताकि यदि उनके 10 प्रतिशत उम्मीदवार भी चुनाव जीत जाते हैं तो केंद्र में बनने वाली सरकार उनके सहयोग पर निर्भर होगी।

 मुझे इस बात पर एक तिरस्कार भरी हंसी आई थी और सोचा था कि ये क्षेत्रीय नेता इससे अधिक के काबिल नहीं हैं और इनका राष्ट्र के हितों से कोई सरोकार नहीं हैं। ये तो बस अपनी छोटे-छोटे मसलों की रस्साकशी में ही लगे रहते हैं। पर उस दिन लोक प्रशासन पढ़ते समय वे शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे। कितने विचारशील और सारगर्भित थे वो शब्द!

आज देश में मोदी सरकार के 4 वर्षों के बाद उन शब्दों के अर्थ और अधिक स्पष्ट हैं। श्रीमती इंदिरा गांधी और उनके दौर को मैंने नहीं देखा और कोई भी सन्दर्भ जिये हुए अनुभव का स्थान नहीं  ले सकता। एक सरकारी अधिकारी के रूप में काम करते हुए मैंने मजबूत सरकार की एक अवधारणा बनाई थी जिसके अनुसार एक मजबूत सरकार वह होती है जिसके आदेश विशेषकर राजनीतिक आदेशों को मानने के लिए अफसरशाही लिखित आदेशों की मांग न करे या नियमों के दायरे को लचीला बना के उन पर अमल करे। लेकिन उस व्यवस्था को क्या कहें जहां पर सरकार को आदेश देने की भी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती, बल्कि पूरा तंत्र और अफसरशाही इसी अनुमान में लगा रहे कि सरकार की इच्छा किसी विषय में क्या हो सकती है और उस आधार पर काम करे।

जहां सरकार एक दूरस्थ कल्पना की चीज हो जिससे स्पष्टीकरण की मांग नहीं की जा सकती और ऐसा व्यवहार केवल अफसरशाही तक सीमित न रहे, मीडिया का बड़ा भाग, उद्योग, कारोबारी जगत और शैक्षणिक जगत बल्कि संवैधानिक संस्थाएं भी एक कल्पित भय के नीचे इसी कयास में काम करें। हर संविधान सम्मत सुरक्षा भी उन्हें भयमुक्त नहीं कर पातीं और उनका यह भय फिर कई गुना बढ़कर जनता में झलकने लगता है क्योंकि वे अपने भय और अनिश्चितता को इन्हीं इरादों के पास ले के जाते हैं और उनके हालात उन्हें आतंकित कर देते हंै। और जब पत्रकारों और शिक्षाविदों के बीच होने वाली रोजमर्रे की चर्चा में यह बात होने लगे कि सत्ता और उसके एजेंटों के जरिए उस सर्वोच्च सत्ता के पास हर जानकारी पहुंच  रही है याने  सरकार वाकई  शक्तिशाली है।

पर यहां यक्ष प्रश्न यह उठता है कि क्या एक मजबूत सरकार का अर्थ एक मजबूत राष्ट्र और मजबूत जनता भी होता है? ऐसा लगता तो नहीं है। जब महान दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल्स अपनी किताब ऑन लिबर्टी में कहते हैं कि जो सरकार एक अज्ञानकारी और मूक जनता पाने के लिए उन्हें बौना बनाती है तो उसे जल्द ही यह भी दिख जाता है कि बौने बहुत कुछ हासिल नहीं करते तो उनका तात्पर्य इसी भेद से है जो एक मजबूत सरकार और मजबूत देश में होता है। इसीलिए जब हम अर्थव्यवस्था और लोक विमर्श के स्तर में लगातार कमी देखते हैं तो यह राष्ट्र के शक्तिशाली होने के चिन्ह तो नहीं हैं। कोई भी राष्ट्र उतनी ही मजबूत होता है जितना कि उसके नागरिकों और समुदायों के बीच का सम्बन्ध मजबूत होता है और ध्रुवीकरण से ग्रसित समाज कभी भी सामाजिक समरसता का परिचायक नहीं हो सकता। लिंचिंग या भीड़ द्वारा हत्या के बढ़ते हादसे भी यही बता रहे हैं कि जनता का न्याय व्यवस्था पर से विश्वास घट रहा है और यह मजबूत राष्ट्र की अवधारणा के विपरीत है। हाल में अमेरिका या हमारे पड़ोसी देशों का व्यवहार भी ऐसा नहीं है जैसा एक शक्तिशाली राष्ट्र के साथ सामान्यत: अपेक्षित है।

इससे पहले के तीन दशकों को यदि देखा जाये तो उनमे अधिकतर साझी और कमजोर सरकारें रहीं जिनसे सवाल करना आसान था और जहां व्यवस्था न तो प्रश्न करने से भयभीत थी और न ही इतनी आश्वस्त कि उनकी प्रसन्नता के विरुद्ध कोई भी अनुशासनात्मक संस्था उनके खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकेगी। इस दौर में विरोध प्रखर था और लोग बहुत सारे गंभीर विषयों के बीच से बहस करते हुए आगे बढ़ गए और धीरे-धीरे एक ज्यादा उत्पादक व्यवस्था पर अपनी सहमति कायम करते चले गए। यह आजादी के बाद सबसे ज्यादा आर्थिक उन्नति का काल था और सबसे कम विघटनकारी भी।  इसी दौर में सबसे ज्यादा अधिकारमूलक कानून भी बने और नागरिकता की संचेतना विकसित हुई। 

मायावती के वक्तव्य पर लौटते हुए हम यह देखते हैं कि वे और उनकी पार्टी ने लगभग 2 दशकों तक इस देश में एक मजबूत सरकार का गठन नहीं होने दिया। समाज के सबसे कमजोर और पदाक्रांत वर्गों को जोड़कर उन्होंने उच्च वर्गों एवं जातियों के वर्चस्व को गम्भीर चुनौती दी। इसके बहुत सारे दूरगामी सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव नजर आए। उनकी पार्टी ने कांग्रेस के जनाधार को लगातार तोड़ा और खासकर उत्तर प्रदेश में उसके जनाधार को गहरा आघात लगाया जिससे कि वह कभी बहुमत में नहीं आ सकी और क्षेत्रीय और विकेन्द्रीकरण की राजनीति करने वाली शक्तियों को जगह मिली। लेकिन इस प्रक्रिया में उन्हें यह आभास नहीं हुआ कि कांग्रेस को कमजोर करके वे प्रतिक्रियावादी और प्रतिगामी शक्तियों को एक अधिक कठोर तंत्र भाजपा के तरफ धकेल रही हैं। इन वर्गों का प्रतिकार 2014 में सामने आया और इसका सबसे ज्यादा नुकसान उनकी पार्टी को ही हुआ।

आज उनके पास लोक सभा में कोई भी सदस्य नहीं है और विधान सभा में इतने कम सदस्य हैं कि सपा और कांग्रेस के सहयोग के बावजूद वे एक भी राज्य सभा उम्मीदवार नहीं जितवा पाईं। तो अब समय आ गया है कि वे अपने राजनीतिक विरासत का पुनर्मूल्यांकन करें। मैं यह कहूंगा कि उनका सबसे बड़ा योगदान यही था कि उन्होंने 20 साल तक देश को एक कमजोर और उदार सरकार दिलाने में मदद की। अब जब उनकी यह विरासत खतरे में है तो उन्हें सोचना होगा कि उन्हें अपने तरीकों में कुछ बदलाव करें और 2019 इसके लिए एक मौका है। इस साल के आखिर होने वाले राज्यों के चुनाव भी इसमें महत्वपूर्ण है क्योंकि तीनों बड़े राज्यों में उनका राजनीतिक प्रभाव है। समय की मांग है कि वे क्षणिक राजनैतिक गणित से ऊपर उठकर अपने 1998 के बयान पर ध्यान दें और सरकारों को जनता की कीमत पर शक्तिशाली न होने दें।

Source:Agency

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