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भारत के इस चंद्र अभियान से रोशन हो सकता है विश्व

By Outcome.c :03-07-2018 05:55


भारत इसी साल अक्टूबर माह में चंद्रमा के लिए एक रोवर लॉन्च करने वाला है। इस यान के साथ ऑर्बिटर, लैंडर और एक रोवर भी होगा। 6 पहियों वाला यह रोवर पूरी तरह सौर ऊर्जा से संचालित है। इसरो का अनुमान है कि लॉन्च होने के 14 दिनों बाद यह धरती पर जरूरी सूचनाएं भेजना शुरू कर देगा। चंद्रमा पर घूमने वाला रोवर सूचनाएं इक_ा कर लैंडर को भेजेगा, लैंडर इन सूचनाओं को विश्लेषित कर धरती पर संप्रेषित करेगा। यह अमेरिकी स्पेस एजेंसी 'नासा' के मंगल अभियान से मिलता-जुलता है। भारत का यह चंद्र रोवर चंद्रमा पर पानी और हीलियम-3 के संकेतों का भी विश्लेषण करेगा। वैज्ञानिकों के अनुसार चंद्रमा पर हीलियम-3 के आइसोटोप यानी समस्थानिक इतनी प्रचुर मात्रा में हैं कि यदि इनका सही दोहन हो सके तो दुनिया की ऊर्जा संबंधी जरूरतों को कई दशकों के लिए साधा जा सकता है।

चंद्र अभियान हमेशा ही धरती वासियों के लिए एक आकर्षक अभियान रहा है। संभवत: इसीलिए 'मिशन-मून' की दौड़ में अमेरिका, चीन, भारत, जापान और रूस के वैज्ञानिक पिछले कई वर्षों से लगे हुए हैं। कई विदेशी उद्योगपति- एलन मस्क, जेफ बेजोस और रिचर्ड ब्रैंसन जैसे दिग्गज भी अंतरिक्ष में अपने सैटेलाइट लॉन्च करने की दिशा में काम कर रहे हैं। यह एक तथ्य है कि न जाने किन वजहों से अंतरिक्ष अनुसंधान में विश्व के अग्रणी देशों में शुमार अमेरिका ने अपने सफल चंद्र अभियान के बाद के वर्षों में चंद्रमा संबंधी शोधकार्यों से अपना ध्यान हटा लिया था। लेकिन चंद्रमा के प्रति दुनिया के दूसरे देशों की दिलचस्पी को देखते हुए वह एक बार फिर इस दिशा में बढ़ रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में अपने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को एक बार फिर से चंद्रमा पर ध्यान देने को कहा है। इस क्रम में अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी नासा ने 19 अरब रुपए का प्रस्ताव सरकार को दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इससे संबंधित आदेश पर हस्ताक्षर भी कर दिए हैं। इसको लेकर नासा ने वर्ष 2020 में 'ल्यूनर ऑर्बिटर यान' को चांद पर भेजने की योजना बनाई है।

अमेरिकी सरकार के इस प्रोजेक्ट की तुलना में आर्थिक दृष्टि से भारत सरकार का 'मिशन-मून' इससे कई गुना कम है। इसरो के 'मून प्रोजेक्ट' का अनुमानित बजट केवल 1.7 अरब रुपए का है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के चेयरमैन के. सिवान का मानना है कि हमारे देशभक्त वैज्ञानिकों के जज्बे के आगे आर्थिक दिक्कतें ढह जाती हैं। उनके मुताबिक चंद्रमा पर परमाणु ऊर्जा की खोज कई देश कर रहे हैं। जिन देशों के पास इसे खोजकर धरती पर लाने की क्षमता है, वे इस पूरी प्रक्रिया को आगे ले जाएंगे। भारत इस प्रक्रिया में इन देशों के साथ ही नहीं चलना चाहता, बल्कि आगे बढ़कर उनका नेतृत्व करना चाहता है। 1982 में इसरो ज्वाइन करने वाले एयरोनॉटिक्स इंजीनियर के. सिवान ने कहा कि हम इस अभियान के लिए तैयार हैं। भारतीय वैज्ञानिकों का चंद्रमा संबंधी अनुसंधान नया नहीं है। भारत ने अपना चंद्रयान-1 मिशन अक्टूबर 2008 में लॉन्च किया था, और पहली बार चंद्रमा पर पानी के होने के प्रमाण दुनिया को दिए थे। चंद्रयान-1 ने लॉन्च होने के बाद करीब 1 दशक में चंद्रमा के 3400 से ज्यादा चक्कर लगा लिए हैं और यह अब भी वैज्ञानिकों के लिए जरूरी डाटा भेज रहा है।

यह एक ऐसी उड़ान है, जिसका कोई अंत नहीं, और ये कुछ ऐसी खोज हैं, जिनका उद्देश्य ही मानव विकास है। भारत के अंतरिक्ष और परमाणु कार्यक्रमों पर यह बात पूरी तरह सटीक बैठती है। जब समूची दुनिया परमाणु ऊर्जा विस्फोट के विध्वंस वाले पहलू पर जोर दे रही थी और भारत इस क्षेत्र में शांति और मानवता के हित में काम कर रहा था, तब दुनिया के तमाम ताकतवर देश हमें हमारे इन प्रयासों को पीछे ढकेलने की कोशिश में हम पर प्रतिबंध थोप रहे थे। उस समय उनका एक ही मकसद था कि बिना उनकी मदद के आने वाले कल के सर्वाधिक उपयोगी 'अंतरिक्ष अनुसंधान' और 'परमाणु ऊर्जा' के क्षेत्र में कोई भी देश उनकी बराबरी में अपने पैरों पर खड़े न हो सके। पर हमारे अंतरिक्ष और परमाणु शोध से जुड़े वैज्ञानिकों और देश पर शासन कर रहे नेतृवर्ग ने इस मसले पर कभी कोई समझौता नहीं किया। वैज्ञानिकों ने अपनी अड़चनों को ही अपनी ताकत बनाया और लंबे शोध से सफलता हासिल की। नतीजा साफ  है। आज भारत अपने परमाणु कार्यक्रमों और अंतरिक्ष से जुड़े कार्यक्रमों में दुनिया के सर्वाधिक विकसित देशों अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन से होड़ कर रहा है, और कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जिनमें उनसे काफी आगे निकल गया है। जैसे सस्ता उपग्रह प्रक्षेपण, अंतरिक्ष यान निर्माण, भारी पानी निर्माण आदि। 

अब भारत के चंद्र अभियान कार्यक्रम को ही लें, तो हमारे वैज्ञानिकों का पूरा ध्यान चंद्रमा से मिलने वाली ऊर्जा पर है। भारतीय वैज्ञानिक चंद्रमा पर ऐसे 'बिजली-घर' की तलाश में हैं, जिसके मिल जाने के बाद पूरे विश्व को न्यूक्लियर इनर्जी से रोशन किया जा सकेगा। इस दिशा में हमारे अंतरिक्ष और परमाणु वैज्ञानिक मिल कर काम कर रहे हैं। चांद पर परमाणु ऊर्जा की खोज में जुटे वैज्ञानिकों का दावा है कि अगर उनका शोध पूरा हुआ, तो दुनिया की अगले 250 साल तक की ऊर्जा जरूरतें पूरी हो जाएंगी। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, चंद्रमा को लेकर भारतीय वैज्ञानिकों का यह अनुसंधान, दुनिया में अपनी तरह का अनोखा है।

भारत इसी साल अक्टूबर माह में चंद्रमा के लिए एक रोवर लॉन्च करने वाला है। इस यान के साथ ऑर्बिटर, लैंडर और एक रोवर भी होगा। 6 पहियों वाला यह रोवर पूरी तरह सौर ऊर्जा से संचालित है। इसरो का अनुमान है कि लॉन्च होने के 14 दिनों बाद यह धरती पर जरूरी सूचनाएं भेजना शुरू कर देगा। चंद्रमा पर घूमने वाला रोवर सूचनाएं इक_ा कर लैंडर को भेजेगा, लैंडर इन सूचनाओं को विश्लेषित कर धरती पर संप्रेषित करेगा। यह अमेरिकी स्पेस एजेंसी 'नासा' के मंगल अभियान से मिलता-जुलता है। भारत का यह चंद्र रोवर चंद्रमा पर पानी और हीलियम-3 के संकेतों का भी विश्लेषण करेगा। वैज्ञानिकों के अनुसार चंद्रमा पर हीलियम-3 के आइसोटोप यानी समस्थानिक इतनी प्रचुर मात्रा में हैं कि यदि इनका सही दोहन हो सके तो दुनिया की ऊर्जा संबंधी जरूरतों को कई दशकों के लिए साधा जा सकता है।

अमेरिका के अपोलो मिशन से यह बात साबित हो चुकी है कि चंद्रमा पर हीलियम-3 प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। अपोलो-17 मिशन के तहत साल 1972 में चंद्रमा पर उतरने वाले अंतरिक्ष यात्री जियोलॉजिस्ट हैरिसन स्किमिट ने भी हीलियम-3 के खनन की संभावनाएं जताई थीं। भारत का चंद्रयान-2, चंद्रमा पर इसी हीलियम-3 के जमा होने के कारणों की पड़ताल करेगा। दरअसल, सूर्य की तरफ से चलने वाली हवाएं चंद्रमा पर लगातार हीलियम-3 की बरसात करती रहती हैं। ये हवाएं हमारी धरती पर भी आती हैं, लेकिन पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र इन हवाओं से हमारे वातावरण को बचा लेता है। वहीं, चंद्रमा पर इन सौर हवाओं को रोकने के लिए कोई कवच नहीं है, इसलिए वहां भारी मात्रा में हीलियम-3 इक_ा होता जाता है। हीलियम-3 परमाणु ऊर्जा का अपार स्रोत है।

यूरोपियन स्पेस एजेंसी के अनुसार, 'हीलियम-3 परमाणु ऊर्जा के सबसे सुरक्षित स्रोत में से एक है। परमाणु ऊर्जा पैदा करने वाले अन्य रासायनिक तत्वों की तुलना में यह रेडियोएक्टिव नहीं है। साथ ही अन्य तत्वों की तरह इसके अपशिष्ट भी नहीं होते। नासा की सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य और विस्कॉन्सिन-मेडिसन यूनिवर्सिटी के फ्यूजन टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर गेराल्ड कुलसिंस्की का अनुमान है कि चंद्रमा पर हीलियम-3 का 10 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा बड़ा भंडार है। इसमें से एक चौथाई यानी ढाई लाख टन हीलियम-3 धरती पर लाया जा सकता है। 1 टन हीलियम-3 की अनुमानित कीमत करीब 5 अरब रुपए है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर चंद्र अभियान सफल हुआ तो धरती को कितना लाभ होगा। हालांकि इसमें कई कठिनाइयां भी हैं, जिनमें हीलियम-3 को इक_ा करना, उसे धरती पर लाना, यहां उसकी गुणवत्ता के अनुरूप फ्यूजन सेंटर बनाकर ऊर्जा में तब्दील करना शामिल है। फिर भी वैज्ञानिकों की इस आस और कोशिशों को सलाम तो कर ही सकते हैं!

Source:Agency

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