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नीतीश कुमार मंझधार में

By Outcome.c :02-07-2018 09:17


नीतीश कुमार एक परजीवी नेता हैं। वे कभी भाजपा तो कभी लालू के भरोसे राजनीति करते रहे हैं। जब उन्हें भाजपा से हाथ मिलाना होता है, तो वे लालू यादव के भ्रष्टाचार का हवाला देते हैं और जब भाजपा को छोड़ना होता है, तो एकाएक उनकी धर्मनिरपेक्षता जाग जाती है और भाजपा के अंदर उन्हें घोर सांप्रदायिकता के दर्शन होने लगते हैं। इस बार उनको भाजपा के अंदर सांप्रदायिकता के दर्शन एक बार फिर होने लगे हैं और वे लगातार संकेत दे रहे थे कि एक बार फिर वे लालू से हाथ मिला सकते हैं। उनका साथ कांग्रेस के नेता भी दे रहे थे। शायद कांग्रेस का आलाकमान भी यही चाहता था, इसलिए बिहार के कांग्रेस प्रभारी ने भी नीतीश से अपील की यदि वे भाजपा का साथ छोड़ते हैं तो महागठबंधन में उनका स्वागत किया जाएगा।

लोकसभा चुनाव में सीटों के बंटवारो को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से बातचीत होने वाली है। लेकिन उसके पहले नीतीश अपने आपको कमजोर पा रहे हैं। कुछ दिन पहले उनकी पार्टी के प्रवक्ता और वे खुद भी कुछ ऐसे तेवर दिखा रहे थे, मानो यदि भाजपा ने उनकी बात नहीं मानी, तो पता नहीं वह क्या कर देंगे। वे भाजपा नेताओं पर दबाव बना रहे थे और कह रहे थे कि उनके बिना बिहार में भाजपा जीत हासिल कर ही नहीं सकती, जबकि सच यह है कि 2014 में भाजपा उनके बिना चुनाव लड़ रही थी और वे भाजपा के बिना चुनाव लड़ रहे थे। तब भाजपा को 22 सीटें मिली थीं और उनकी पार्टी को सिर्फ  2 सीटें और वे दोनों भी बहुत ही मामूली मतों के अंतर से।

2014 में हुई अपनी पराजय को ढकने के लिए नीतीश 2015 के चुनावों का हवाला दे रहे थे और कह रहे थे कि चूंकि 2015 के चुनाव 2014 के चुनाव के बाद हुए हैं, इसलिए बाद वाले चुनाव के अनुसार ही सीटों का बंटवारा होना चाहिए। लेकिन वे इस सच को दबा रहे हैं कि 2015 में उनकी जो सीटें निकली थीं, वे लालू यादव के मुस्लिम-यादव समीकरण के वोटो के कारण निकली थी और आज न तो नीतीश के पास मुस्लिम वोट हैं और न ही यादव वोट हैं। वे एक और सच को दबा गए कि उस चुनाव में भाजपा को 30 फीसदी से भी ज्यादा मत मिले थे, जब नीतीश कुमार के जनता दल(यू) को 2015 के उस चुनाव मे 20 फीसदी से भी कम मत मिले थे।

नीतीश कुमार एक परजीवी नेता हैं। वे कभी भाजपा तो कभी लालू के भरोसे राजनीति करते रहे हैं। जब उन्हें भाजपा से हाथ मिलाना होता है, तो वे लालू यादव के भ्रष्टाचार का हवाला देते हैं और जब भाजपा को छोड़ना होता है, तो एकाएक उनकी धर्मनिरपेक्षता जाग जाती है और भाजपा के अंदर उन्हें घोर सांप्रदायिकता के दर्शन होने लगते हैं। इस बार उनको भाजपा के अंदर सांप्रदायिकता के दर्शन एक बार फिर होने लगे हैं और वे लगातार संकेत दे रहे थे कि एक बार फिर वे लालू से हाथ मिला सकते हैं। उनका साथ कांग्रेस के नेता भी दे रहे थे। शायद कांग्रेस का आलाकमान भी यही चाहता था, इसलिए बिहार के कांग्रेस प्रभारी ने भी नीतीश से अपील की यदि वे भाजपा का साथ छोड़ते हैं तो महागठबंधन में उनका स्वागत किया जाएगा। इस बीच तेजस्वी लगातार उस संभावना को खारिज करते रहे।

पर नीतीश ने हार नहीं मानी और भाजपा पर अपना दबाव बनाने के लिए लालू यादव का हालचाल जानने के लिए मुृबई फोन कर डाला, जहां वे अपना इलाज करा रहे हैं। लालू यादव को फोन करने के पीछे नीतीश का दोहरा खेल करने का इरादा था। वे महागठबंधन में शामिल होने की भूमिका तो तैयार ही कर रहे थे और उनकी कोशिश यह भी थी यदि महागठबंधन का डर दिखाकर भाजपा से ज्यादा हासिल कर लिया जाता है, तो उसमें भी कोई बुरा नहीं है। बिहार के भले के नाम पर वे भाजपा के साथ बने रहेंगे।शायद लालू यादव भोले हैं। अपने पुराने संगी साथियों के प्रति वे संवदेनशील भी हैं। इसलिए बार बार उनसे धोखा खाकर उन्हें अपना भी लेते हैं। इसी उम्मीद में नीतीश कुमार जी रहे थे। वे शायद तेजस्वी को फिर से उपमुख्यमंत्री बनाने का वादा भी करना चाह रहे हैं। वे बिल्कुल उस सरकार की वापसी का सौदा लेकर राजद से बात करना चाह रहे थे, ताकि राजद के नेताओं के मन में भी सत्ता की भूख जगे और एक बार फिर सत्ता की चाशनी को चाटने के लिए वे नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार कर लें।

और कांग्रेस इसमें अपना खेल सफल होता देख रही थी। नीतीश को भाजपा से तोड़कर राजद से जोड़ने के बाद कांग्रेस भी बिहार की सत्ता में आ जाती और 2015 के महागठबंधन के फॉर्मूले के आधार पर लोकसभा में सीटें हासिल कर जीतने की उम्मीद भी कर सकती थी। इसलिए कांग्रेस के नेता पूरी कोशिश कर रहे थे कि नीतीश वापस आ जाएं। नीतीश तो वापस आ भी सकते थे, क्योंकि इसमें उनको नुकसान कुछ भी नहीं था, बल्कि फायदा ही फायदा था, लेकिन उसके लिए जरूरी था कि राजद तैयार हो जाए।

और अब राजद की बागडोर तेजस्वी और राबड़ी के हाथों में है। तेजस्वी कुछ मिनट के लिए भूल सकते हैं कि उनको बदनाम करते हुए ही नीतीश ने महागठबंधन छोड़ा था, लेकिन राबड़ी इस बात को आसानी से नहीं भूल सकती, क्योंकि एक मां अपने बेटे के हाथ किए जाने वाले दुर्व्यवहार को आसानी से नहीं भूलती और दुर्व्यवहार करने वालों को माफ  भी नहीं करतीं। इसलिए तेजस्वी ने खुद अपने स्तर से या अपनी मां की सलाह पर साफ साफ  स्पष्ट कर दिया कि नीतीश को फिर से महागठबंधन में लिए जाने का कोई सवाल ही नहीं। उन्होंने तो कांग्रेस को भी लताड़ लगा दी और कह दिया कि नीतीश के गठबंधन में वापस लिए जाने का फैसला कांग्रेस नहीं कर सकती।

इसके कारण कांग्रेस नेताओं में बेचैनी भी है, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान तो नीतीश कुमार का ही हुआ है, जो अब अपने को बड़ा भाई मानने के दावे को दुहरा नहीं रहे हैं। अब भारतीय जनता पार्टी और उसकी केन्द्र सरकार के खिलाफ  न तो नीतीश और न ही उनके प्रवक्ता आंखें तरेर रहे हैं। तेजस्वी की उस घोषणा से यदि कोई ज्यादा खुश हुआ होगा, तो वह अमित शाह होंगे, क्योंकि अब उनके सामने बातचीत करते समय नीतीश शेर नहीं बन पाएंगे और भारतीय जनता पार्टी का साथ छोड़ने की धमकी नहीं दे पाएंगे, क्योंकि अकेले चुनाव लड़ने पर उनकी वही हालत होगी, जो 2014 में हुई थी। उस समय तो फिर भी उनकी छवि बेहतर थी, पर अब तो उनकी छवि खराब हो गई है शक्ति भी कम हो गई है। इसलिए भाजपा के साथ बने रहना उनकी मजबूरी है और यदि वे उसे भी छोड़ देते हैं, तो वे मझधार में डूब जाने के लिए अभिशप्त हैं। 
 

Source:Agency

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