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जिन्ना की तस्वीर को लेकर बखेड़ा

By Outcome.c :12-05-2018 08:21


खुद को हिन्दुत्ववादी मानसिकता का पोषक व रक्षक कहने वाले तत्व अब पाकिस्तान के संस्थापक कायदेआजम मुहम्मद अली जिन्ना की अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विद्यार्थी भवन में 80 वर्ष पहले से लगी तस्वीर हटाने का आन्दोलन कर रहे हैं, जबकि अलीगढ़ जिला प्रशासन का कहना है कि वह ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए कटिबद्ध है, ताकि इसे लेकर संघर्ष व हिंसा की स्थिति न उत्पन्न होने पाये और शांति व्यवस्था में खलल न पड़े।

अफवाहों से जन्म लेने वाली विपरीत स्थितियों से बचने के लिए उसे संदेशों के आदान-प्रदान के इलेक्ट्रानिक माध्यमों के लिए जरूरी इंटरनेट सेवाएं भी, जिनका प्रयोग मोबाइल फोनों के जरिए भी होता है, बंद करनी पड़ी हैं। लेकिन इस बन्दी को अनन्तकालिक इसलिए नहीं बनाया जा सकता क्योंकि इसे स्थानीयता के आधार पर स्थायी रूप नहीं दिया जा सकता। ऐसा करने की किसी भी कोशिश से जनता के जानने के अधिकारों पर अंकुश का सवाल भी उठ जायेगा, जो भारतीय संविधान में उल्लिखित उसके मौलिक अधिकारों की देन है। 

बहरहाल, जिन्ना की तस्वीर के खिलाफ आन्दोलन चलाने वालों का कहना है कि 'बंटवारे के दोषी' जिन्ना का महिमामंडन, प्रचार-प्रसार और सम्मान देश में अलगाववादी मानसिकता का समर्थन होगा। ऐसी ही मानसिकता के कारण 1947 में देश बंटा और बड़े स्तर पर खून खराबा भी हुआ। बंटवारे के बाद, जिन्हें विवादित भाग कहा जाता है, उनमें हिंसक आन्दोलन और आतंकवादी गतिविधियां अभी भी चल ही रही हैं। यह प्रश्न अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ तक में उठाया जा चुका है। फिर भी जिन्हें पाक प्रायोजित 'आतंकवाद का मसीहा' करार देकर संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रतिबंधित सूची में डालने पर जोर दिया जाता है, चीन के निषेधाधिकार के प्रयोग के कारण वे पूरी तरह निर्भय बने हुए हैं और उनका बाल भी बांका नहीं हो पा रहा।  

अलबत्ता, अमेरिका जो पहले सैनिक व आर्थिक तौर पर पाकिस्तान का समर्थन करता था, अब उसे आतंकवाद का कुसूरवार मानने लगा है। लेकिन इससे स्थिति में इसलिए कोई निर्णायक परिवर्तन नहीं होता क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ में जिस निषेधाधिकार को पांच देशों के विशेषाधिकार के रूप में स्वीकार किया गया है, उसके तहत चीन की स्थिति अप्रभावित रहती है।

इस निषेधाधिकार को राष्ट्रों की बराबरी के सिद्धान्त के विपरीत कहा जाता है, फिर भी यह अभी विद्यमान चला आ रहा है और उसके विरोधी विश्व जनमत का इतना समर्थन नहीं जुटा सके हैं जिससे संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन के समय स्वीकार की गयी नीतियों में परिवर्तन करके उसे समतावादी संगठन बनाया जा सके। 

दूसरी ओर इस सवाल पर जायें कि देश के विभाजक तत्व कौन से हैं, तो पहला नाम उनका ही आता है, जो कहते हैं कि इसे परस्परविरोधी राष्ट्रीयताओं, नीतियों, विचारों और संघर्षों के बीच समन्वय के केन्द्र के बजाय हिन्दू राष्ट्र मानना होगा और तभी 80 प्रतिशत बहुमत जातियों को शांतिपूर्वक रहने का अधिकार मिल सकेगा। 

इतिहास में जायें तो 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गठन हो रहा था तो उसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और विनायक दामोदर सावरकर की पुस्तक में कहा गया था कि परस्परविरोधी विचारों और धर्म पर आधारित मान्यताओं के अनुयायियों का देश में एक साथ रह पाना मुश्किल है, इसलिए इनका विभाजन किया ही जाना चाहिए। 

अंग्रेजों के काल में जो क्षेत्र 'इंडिया' के नाम से जाना जाता था, उसमें म्यांमार और श्रीलंका भी थे, जो बाद में अलग हो गये। भारत में भी देशी रियासतों का वर्चस्व था, जिनमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख या अन्य धर्मों के अनुयायी छोटे बड़े राजे-रजवाड़े अपनी मर्जी के मुताबिक व्यवस्थाएं किया करते थे। स्वतंत्रता के बाद इन रियासतों के भारत में विलय का प्रयास हुआ तो हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर जैसी रियासतें इसके लिए तैयार नहीं हुईं और उन्होंने अपनी अलग हैसियत बनाये रखी। बाद में इनकी स्थितियों में जो परिवर्तन हुए, उन्हें शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विश्वासों का परिचायक नहीं कहा जा सकता।

1940 में मुस्लिम लीग ने भी प्रस्ताव पारित करके अलग पाकिस्तान की मांग की, तो वह पूर्ववर्ती तथाकथित हिन्दू विचारकों की वैचारिक पूरक ही थी। फिर इस बात का क्या किया जाये कि विभाजन के बाद भी हिन्दू अनेक जातियों, श्रेणियों, वर्गों और विश्वासों में विभाजित रहे और उनकी यह स्थिति एकता में सबसे अधिक बाधक बनी रही। इस बाधा के शमन के लिए संविधान में सर्वधर्मसम्भाव पर आधारित धर्मनिरपेक्षता को ही भारत की पहचान माना गया, जिसमें आज तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ। 

हिन्दुत्व की मानसिकता वाले सिखों, जैनियों व बौद्धों को भी हिन्दू ही मानते हैं, लेकिन खालिस्तान के निर्माण का जो हिंसक आन्दोलन चला, वह इसलिए असफल हुआ, क्योंकि और तो और, सिखों ने भी उसका विरोध किया। इसी प्रकार पाकिस्तान तो इस आधार पर बना था कि पिछले चुनाव में जिन सूबों में कांग्रेस जीती हो, उन्हें भारत में और जिनमें मुस्लिम लीग जीती हो, उन्हें पाकिस्तान में मिलाया जाये। चूंकि कांग्रेस पख्तूनिस्तान में भी जीती थी, इसलिए वह भारत के हिस्से आया। बाद में जनमतसंग्रह का सिद्धान्त अपनाकर भले ही उसे पाकिस्तान के पक्ष में कर दिया गया, लेकिन इस देश के ज्यादातर मुसलमान भारत में ही रहे यानी उन्होंने पाकिस्तान के विकल्प को स्वीकार नहीं किया। इससे सिद्ध होता है कि सिखों और मुसलमानों का बहुमत धार्मिक अलगाववाद का विरोधी रहा है और है।

जहां तक जिन्ना का सम्बन्ध है, वे कांग्रेस के ही नेता थे। बाद में मुस्लिम लीग के साथ उनका रिश्ता वैसा ही था, जैसे महामना मदनमोहन मालवीय ने कांग्रेस छोड़कर हिन्दू महासभा गठित की। लेकिन जिन्ना की यह एकमात्र पहचान नहीं है। उनकी दूसरी पहचान वह भी है, जिसे स्वीकार करने के कारण भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के समर्थकों ने ही उनके खिलाफ आन्दोलन चलाया था। आन्दोलन के बावजूद आडवाणी अपने इस मत पर डटे रहे थे कि पाकिस्तान के निर्माण के समय जिन्ना का बयान सर्वधर्मसमभाव का समर्थक है और वे लोगों को बराबरी का अधिकार देने के समर्थक थे। इसलिए उन्हें साम्प्रदायिक नहीं कहा जा सकता। 

लालकृष्ण आडवाणी देश के उपप्रधानमंत्री पद तक पर विद्यमान रहे हैं। दुर्भाग्य यह कि फिर भी उनके खेमे के हिन्दुत्ववादी उनकी इस बात पर यकीन नहीं करते। 

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विद्यार्थी भवन में लगी जिन्ना की तस्वीर पाकिस्तान बनने के पूर्व की है। तब की, जब कांग्रेस के नेता बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चला तो जिन्ना उनकी पैरवी करने वाले एडवोकेट थे। हां, तिलक को उनका वह सहयोग मेहनताने की एवज में अर्जित नहीं किया गया था। सवाल है कि क्या 80 वर्ष पूर्व के और उसके बाद के जिन्ना को एक ही माना जा सकता है? अगर नहीं तो साफ है कि ताजा जिन्नाद्रोह वास्तव में धर्म पर आधारित मान्यता वाला ही है। ऐसा नहीं होता तो जिस अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के लिए जमीन क्रान्तिकारी राजा महेन्द्रप्रताप सिंह ने दी और उसके निर्माण में सैकड़ों हिन्दुओं ने सहयोग दिया, उसे मुस्लिम समर्थक संस्थान के रूप में क्यों परिभाषित किया जाता? उसके संस्थापक सर सय्यद अहमद खां तो न पाकिस्तान गये और न उनके समर्थक थे।

साफ कहें तो इस सिलसिले में जो कुछ भी हो रहा है, वह वास्तव में विद्यमान भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के प्रयत्नों का ही हिस्सा है। ऐसा प्रयत्न करने वाले सत्ता में होने के कारण उत्साहित हो सकते हैं, लेकिन अपने प्रयत्नों को सफलता तक नहीं पहुंचा सकते। इसलिए कि अब देशवासी उनसे सावधान रहना सीख गये हैं। 
 

Source:Agency

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