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सर्वाधिक अपव्ययकारी बजट सत्र

By Outcome.c :10-04-2018 08:04


सत्तारूढ़ दल के प्रस्तावों तथा व पीठासीन अधिकारी के निर्णय से सहमत नही हैं तो वे सदन से बर्हिगमन कर सकते हैं या पूरे सत्र का बहिष्कार करके अपना विरोध व्यक्त कर सकते हैं। वे रैली आयोजित करके या जंतर-मंतर पर धरना देकर आम जनता का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं । किन्तु अपनी बात मनवाने के लिए पूरे सदन का समय अपव्यय करने का अधिकार उन्हें नहीं हैं। मौजूदा  बजट सत्र में पीएनबी नीरव मोदी घोटाले या दलित उत्पीड़न को लेकर संसद में हुआ  हंगामा तो समझ में आता है किन्तु आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग लेकर क्षेत्रीय दलों के सांसदों द्वारा हर दिन तख्तियों लेकर सदन में आकर हंगामा कर  संसद का कामकाज रोकने को निंदनीय कृत्य कहा जा सकता है।

आंग्ल दैनिक फायनेंशियल एक्सप्रेस ने 6 अप्रैल को समाप्त हुए मौजूदा बजट सत्र को समय एवं धन के अपव्यय तथा निम्न उत्पादकता के लिहाज से इस दशक का सबसे खराब सत्र करार दिया है। लोकसभा एवं राज्यसभा दोनों में ही कुछ क्षेत्रीय दलों के संासदों द्वारा किए जाने वाले नियमित हंगामे के कारण लोकसभा में कामकाज की उत्पादकता मात्र 25 प्रतिशत तथा राज्यसभा में उत्पादकता 35 प्रतिशत रही, जबकि 2017 के बजट सत्र में लोकसभा में कामकाज की उत्पादकता 108 प्रतिशत तथा राज्यसभा में उत्पादकता 86 प्रतिशत रही थी। यद्यपि पिछले साल संसद में नोटबंदी का मुद्दा काफी गरमाया हुआ  था फिर भी लोकसभा में निर्धारित कामकाज के घंटों से अधिक समय तक बैठकर सदस्यों ने कामकाज निबटाया था। मौजूदा बजट सत्र में हंगामे के कारण कामकाज नहीं हो पाने के कारण इस सत्र के आयोजन में हुए कुल खर्च के आधार पर भारतीय करदाताओं के 190 करोड़ रुपए बर्बाद हुए हैं। अनेक सांसद बहस में हिस्सा लेने के लिए पूरी तैयारी से आते थे किन्तु हंगामे  के कारण पीठासीन अधिकारियों द्वारा सत्रावसान कर दिए जाने से वे बोलने से वंचित रह जाते थे। 

संसद के दोनों सदनों में हंगामे के कारण कामकाज न होने देने के लिए भाजपा द्वारा कांग्रेस दल को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। जबकि कांग्रेस दल द्वारा कहा जा रहा है कि 15वीं लोकसभा में 357 बैठकों के लिए निर्धारित 1344 घंटों में से भाजपा द्वारा 2-जी और कोयला आबंटन घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल आदि के नाम से अवरोध और स्थगन के कारण 891 घंटे अर्थात संसद का दो तिहाई समय बर्बाद किया गया। यह तो कांग्रेस दल के लिए विचार का विषय है कि यदि विरोधी दल के रूप में भाजपा ने संसद में हंगामा करके अशालीन या हंगामा करके समय बर्बाद किया है तो  कांग्रेस दल से भाजपा की नकल करके उसके पदचिन्हों पर चलकर गलत कार्य करने की बजाय स्वस्थ परंपरा की अपेक्षा थी।  देखा जाय तो दोनों ही दल संसद का कीमती समय नष्ट करने के लिए बराबर के जिम्मेदार हैं। यही कारण है कि भाजपा व कांग्रेसनीत गठबंधन से जुड़े संासदों के संसद में व्यवहार से व्यथित राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने 6 दिसंबर 2016 को सांसदों को संबोधित करते हुए कहा था कि आप चुनकर संसद में कामकाज के लिए आते हैं इसलिए संसद अवरूद्ध करने की बजाय भगवान के लिए संसद में कामकाज करें। 

संसद में अवरोध से कार्य दिवसों के नुकसान में निरन्तर वृद्धि हो रही है। 11वीं लोकसभा में अवरोधों के कारण मात्र 45 घंटों तथा 12वीं  लोकसभा में 68 घंटों का नुकसान हुआ था। कामकाज का नुकसान 13वीं लोकसभा में कई गुना बढ़कर 454 घंटे तथा 14वीं लोकसभा में 423 घंटेका नुकसान हुआ था। 15वीं लोकसभा में भाजपा द्वारा 2-जी और कोयला आबंटन घोटाला, आदर्श सोसायटी, राष्ट्रमंडल खेल आदि के नाम से संसद की कार्यवाही बाधित किए जाने के कारण 891 घंटे का संसद का कीमती समय बर्बाद हुआ। अभी 16वीं लोकसभा का कार्यकाल एक साल बचा हुआ है, लेकिन जिस प्रकार से गिनती के क्षेत्रीय दलों के मुट्ठी भर सांसद हर दिन व्यवधान उपस्थित करके संसद का कीमती समय बर्बाद कर रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि 16वीं लोकसभा समय, धन व उत्पादकता की बर्बादी का कीर्तिमान स्थापित करेगी। संसदीय कार्यमंत्री पवनकुमार बंसल द्वारा 2012 में संसद में लिखित उत्तर में जानकारी दी गई थी कि संसद की हर दिन की बैठक में प्रति मिनिट 2.5 लाख रुपये खर्च होते हैं।  अब तो संासदों के वेतन एवं भत्ते सभी बढ़ चुके हैं, वर्तमान में संसद में बैठक में प्रति मिनिट लगभग 3 लाख रुपए खर्च हाने लगे हैं। 

सांसदों को सदन में अपनी बात कहने की पूरी आजादी रहती है। अपने राज्य के बहुत गंभीर मुद्दों वे संसद की बैठक के पहले अन्य दलों के नेताओं को समझाकर विश्वास में लेकर संसद में उठाने को पूर्ण स्वतंत्र रहते हैं। सत्तारूढ़ दल के प्रस्तावों तथा व पीठासीन अधिकारी के निर्णय से सहमत नहीं हैं तो वे सदन से बर्हिगमन कर सकते हैं या पूरे सत्र का बहिष्कार करके अपना विरोध व्यक्त कर सकते हैं। वे रैली आयोजित करके या जंतर-मंतर पर धरना देकर आम जनता का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं। किन्तु अपनी बात मनवाने के लिए पूरे सदन का समय अपव्यय करने का अधिकार उन्हें नहीं है। मौजूदा बजट सत्र में पीएनबी नीरव मोदी घोटाले या दलित उत्पीड़न को लेकर संसद में हुआ हंगामा तो समझ में आता है किन्तु आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग लेकर क्षेत्रीय दलों के सांसदों द्वारा हर दिन तख्तियों लेकर सदन में आकर हंगामा कर संसद का कामकाज रोकने को निंदनीय कृत्य कहा जा सकता है। इस कृत्य के लिए लोकसभा तथा राज्यसभा के पीठासीन अधिकारियों को हर दिन सत्रावसान करने की बजाय दो या तीन दर्जन विघटनकारी सदस्यों को सदन से निलंबित करके सदन को सुचारू रूप से चलाया जाना चाहिए था। 

लोकसभा की कार्यवाही नियमावली के नियम 373, 374, 374ए तथा 375 के तहत लोकसभाध्यक्ष को सदन गरिमामय ढंग से संचालन के लिए पर्याप्त अधिकार मिले हुए है। मौजूदा बजट सत्र में लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने नियम 375 के तहत हर दिन सदन स्थगित करने या सदन निलंबन  करने के अधिकार का ही प्रयोग किया, जबकि नियम 375 के अंतर्गत ही लोकसभाध्यक्ष को सदन में व्यवधान करने वाले सदस्य को निलंबन का अधिकार भी दिया गया है जिसका उन्होंने प्रयोग नहीं किया।  नियमानुसार सदन में सदस्यों को नारे लिखी हुई तख्तियां लाने का अधिकर नहीं है जबकि तेलगुदेशम के सभी 15 सदस्य हर दिन नारों की तख्तियां लेकर सदन में बेरोक-टोक आते थे। नियम 374 के तहत स्पीकर द्वारा यदि किसी सदस्य को सदन से बाहर जाने के लिए आदेशित किया जाता है तो उस सदस्य को सदन से बाहर जाना ही पड़ेगा अन्यथा मार्शल द्वारा उन्हें बाहर कर दिया जाता है। अनेक दबंग लोकसभाध्यक्ष सदन के गरिमामय संचालन हेतु अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए व्यवधानकारी सदस्यों को निलंबित करते रहे हैं। लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन हंगामा करने वाले सदस्यों को निलंबित करके सदन को सुचारू रूप से चलाने की बजाय हर दिन सदन स्थगित करने या सदन निलंबन के अधिकार का प्रयोग किया। इस प्रकार लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन को भी संसद के मौजूदा सत्र के समय व धन की बर्बादी तथा कामकाज की निम्न उत्पादकता के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है।

संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार के अनुसार संसद में हंगामे के कारण कामकाज न होने का विरोध करते हुए एनडीए के सदस्यों द्वारा 23 दिनों का वेतन व  भत्ते नहीं लेने का फैसला किया गया है। यदि अनंत कुमार एनडीए के नाम से झूठी किस्म की वाहवाही लूटने वाली इस घोषणा की बजाय संदन में आंध्रप्रदेश की तख्तियां सदन में लेकर नारे  हंगामा कर सदन का समय बर्बाद करने वाले सदस्यों के वेतन एवं भत्तों में कटौती का प्रस्ताव रखते तो अधिक उचित होता।
 

Source:Agency

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