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गोरखपुर उपचुनाव: दांव पर योगी आदित्यनाथ का 'सम्मान'

By Outcome.c :10-03-2018 06:12


बीजेपी के साथ ही उसके विरोधी भी मान रहे हैं कि 1999 के बाद पहली बार गोरखपुर में ‘चुनाव’ हो रहा है। यहां 11 मार्च को वोटिंग होनी है। ऐसे में धुर ‘योगी फैक्टर’ पर हाल-फिलहाल का यह आखिरी चुनाव होगा। वजह यह है कि 2019 में यहां नतीजे दोहराने का दबाव अपेक्षाकृत उस चेहरे पर अधिक होगा, जिसके सिर 14 मार्च को गोरखपुर का ताज सजेगा। इसलिए इस चुनाव के नतीजे और नफा-नुकसान सीधे योगी से ही जुड़ते हैं। यही वजह है कि योगी खुद इस चुनाव को ‘अपना’ मानकर पसीना बहा रहे हैं।

योगी का सम्मान दांव पर 
गुरुवार शाम टाउन हाल में हुई योगी की आखिरी सभा में केंद्रीय मंत्री और पूर्व विधायक शिवप्रताप शुक्ल के बोल थे, ‘उपेंद्र शुक्ला की जीत कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि योगी के सम्मान की जीत होगी।’ कमोबेश यही अल्फाज मंच से लेकर जनसंपर्क के दौरान बीजेपी प्रत्याशी उपेंद्र शुक्ल के भी रहते हैं, ‘यह मेरी नहीं योगी आदित्यनाथ के सम्मान की लड़ाई है।’ 

सम्मान के इस ‘बोझ’ को मुख्यमंत्री योगी आदित्याथ भी बखूबी समझ रहे हैं। मुख्यमंत्री होने के बाद भी योगी की सक्रियता इस उपचुनाव में उतनी ही है जितनी अपने चुनाव में होती थी। चुनाव के दौरान योगी की गोरखपुर में 16 सभाएं हुई हैं। शुक्रवार की शाम प्रचार बंद होने तक उन्होंने चार सभाएं कीं। इसके साथ ही रविवार को होने वाले चुनाव की आखिरी रात में बनने वाले समीकरणों को साधने और सुलझाने के लिए भी योगी खुद गोरखपुर में मौजूद रहेंगे। 

योगी का खुद चुनाव में न होना ही विपक्ष की उम्मीद की सबसे बड़ी वजह है। करीब दो दशक बाद पहली बार यहां जातीय गुणा-गणित पर भरोसा जगा है। इसलिए बीजेपी की मशक्कत काफी बढ़ गई है। बीजेपी के प्रदेश मंत्री अनूप गुप्ता एक महीने से अधिक वक्त से यहां बैठकर एक-एक बूथ का हिसाब-किताब पलट रहे हैं। 

बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती योगी के नाम पर निकलने और मिलने वाले स्वत: स्फूर्त वोटों को फिर ईवीएम तक लाना है। जातीय गोलबंदी तोड़ने से लेकर अधिक से अधिक मतदान कराने तक के लिए आधी सरकार ‘सड़क’ पर है। शुक्रवार को चुनाव प्रचार के आखिरी दिन केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के साथ ही योगी सरकार के मंत्री सुरेश राणा भी गोरखपुर में घूमते रहे। करीब 27 सांसद-विधायक अलग से जनता के बीच पहुंच रहे हैं। 

Source:Agency

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