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प्रधानमंत्री के झुंझुनू दौरे के निहितार्थ

By Outcome.c :09-03-2018 09:15


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजस्थान के झुंझुनू पहुंचे, और यहां से बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर पर फैलाने के साथ-साथ राष्ट्रीय पोषाहार मिशन की शुरुआत की। एक लिहाज से देखें तो बेटियों से जुड़ी सरकारी योजना को शुरु करने के लिए झुंझुनू का चयन सही है, क्योंकि इस इलाके में सचमुच बेटियों को बचाने के लिए समाज जागरूक हुआ है। 2011 मेंं राजस्थान के इस जिले की गिनती सबसे खराब लिंगानुपात वाले जिलों में होती थी। यानी यहां लड़कों के मुकाबले लड़कियों के जन्म लेने की संभावनाएं कम होती थीं। 2011 की जनगणना में 1000 लड़कों पर मात्र 837 लड़कियां थीं, वहीं अब यह संख्या 1000 लड़कों पर 955 लड़कियों की हो गई है।

साल दर साल लिंगानुपात में सुधार हुआ है और इसके लिए झुंझुनू को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से पिछले दो सालों में कई बार सम्मानित भी किया जा चुका है। दरअसल यहां प्रशासनिक और सामाजिक प्रयासों से जनजागरूकता फैलाई जा रही है, ताकि लड़कियों को बोझ न समझ कर सौगात समझा जाए। यहां के अधिकारी हर हफ्ते मंगलवार को एक जन सुनवाई करते हैं, जिसमें लिंगानुपात से जुड़ी जानकारियां साझा की जाती हैं, शिकायतें सुनी जाती हैं। इससे गांवों में लोगों की सोच में काफी बदलाव आया है।

झुंझुनू जैसे प्रयोग देश के अन्य जिलों में भी किए जाएं तो फिर बेटी बचाओ जैसे नारों की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लेकिन बाकी देश तो छोड़िए, राजस्थान में ही लड़कियों के प्रति सोच अभी कहां बदल सकी है। अभी 4 मार्च को राजस्थान सरकार की ओर से सभी शासकीय कालेजों को एक पत्र भेजा गया है, जिसमें विद्यार्थियों के लिए ड्रेस कोड लागू करने कहा गया है। कालेजों से कहा गया है कि वे 12 मार्च तक विद्यार्थियों के ड्रेस का रंग तय करके भेजें। बहुत से निजी कालेजों, व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों यहां तक कि कार्पोरेट दफ्तरों में भी इसी तरह ड्रेस कोड लागू रहता है, लेकिन वहां लड़कों-लड़कियों की पोशाकों में भेदभाव नहींं होता। लेकिन राजस्थान सरकार चाहती है कि कालेज में पढ़ने वाले लड़के पैंट, शर्ट, जूते, मोजे पहनें और सर्दियों में जर्सी डाल लें।

जबकि लड़कियां सलवार-कमीज-दुपट्टा या साड़ी पहनें और सर्दियों में कार्डिगन पहन लें। इसका मतलब ये हुआ कि लड़कियोंं के लिए जींस, टी शर्ट, कोट, पैंट ये सब पहनना वर्जित होगा। उच्च शिक्षा मंत्री किरण माहेश्वरी का कहना है कि ड्रेस कोड से कालेज के बाहर के लोगों और विद्यार्थियों को अलग-अलग पहचाना जा सकेगा। उनका मानना है कि बाहरी लोग या पूर्व छात्र कालेज परिसरों में आकर अनावश्यक विघ्न पैदा करते हैं। अगर समस्या बाहरी लोगों से है तो क्या इसके लिए कालेज परिचय पत्र जारी नहीं कर सकता, जिसे प्रवेश द्वार पर दिखाकर केवल विद्यार्थी ही भीतर आ सकेें। लड़कियों को जींस-शर्ट या आधुनिक कपड़े पहनने से रोकने के लिए एक से बढ़कर एक लचर तर्क पेश किए गए हैं, किरण माहेश्वरी का तर्क भी उनमें से एक है। 

 
उत्तरप्रदेश में भी आदित्यनाथ योगी ने पिछले साल सत्ता संभालने के बाद शासकीय कालेजों में ड्रेस कोड की वकालत की थी। उन्होंने शिक्षकों से भी कहा था कि वे जींस-टीशर्ट छोड़ें और सलीके के कपड़े पहनें, क्योंकि शिक्षकों को देखकर छात्र सीखते हैं। जींस पर पाबंदी का यह एक और बेकार तर्क है। क्योंकि हमारे कई तथाकथित गुरु और बाबा जो भगवाधारी हैं या संन्यासियों जैसे कपड़े पहनते हैं, उन्होंने समाज में कैसे संस्कार फैलाएं हैं, इसके कई उदाहरण समाज ने बीते ïवर्षों में देखे हैं। सीधी बात यह है कि कपड़ों से संस्कारों या अनुशासन का वास्ता जोड़कर दरअसल फासीवादी सोच है।

फासीवाद में व्यक्तिगत आजादी पर कई तरह की पाबंदियां लगाई जाती हैं। आज आपको अपनी मर्जी के कपड़े पहनने से भी रोका जाएगा, कल भोजन पर पाबंदी लगेगी और परसों घूमने-फिरने पर। क्या इस तरह की तानाशाही में कोई समाज सचमुच आगे बढ़ सकता है? सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, बिजली, पानी, सड़क, सिंचाई ऐसी दर्जनों जिम्मेदारियों को पूरा करने में अपनी ऊर्जा लगाए, न कि हम क्या पहनें और क्या खाएं, यह तय करती रहे। जहां तक बात झुंझुनू में प्रधानमंत्री के दौरे की है, तो यह केवल बेटी बचाने के लिए नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक मकसद कहीं ज्यादा हैं। पिछले सात महीनों में प्रधानमंत्री तीसरी बार राजस्थान पहुंचे हैं, क्योंकि यहां जल्द ही चुनाव हैं।

उपचुनावों और पंचायत चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा, तो आने वाले महीनों में हम कुछ और अवसरों पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को राजस्थान में देख सकते हैं। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ की शुरुआत वे दिल्ली या हरियाणा में भी कर सकते थे, जहां महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर सबसे ज्यादा है। 
 

Source:Agency

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