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भ्रष्टाचार पर फैसले

By Outcome.c :26-12-2017 07:46


बीते शनिवार चारा घोटाले के एक और मामले में सीबीआई अदालत ने लालू प्रसाद यादव को दोषी ठहराया और उन्हें फिर जेल जाना पड़ा। मौजूदा दौर के कद्दावर नेताओं में लालू प्रसाद ही एकमात्र ऐसे नेता हैं, जो भ्रष्टाचार के आरोप में लगातार मुकदमों का सामना करते रहे और बार-बार जेल भी गए। इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि तमाम नेताओं में केवल वे ही भ्रष्ट हैं या केवल उन्होंने ही अपने शासनकाल में अकूत संपत्ति इक_ा की हो। भारतीय राजनीति का चलन तो ऐसा हो गया है कि पार्षद जैसा शुरुआती ओहदा ही संपत्ति जोड़ने के तमाम अवसर दे देता है, फिर मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री रहें तो बात ही क्या है? एक दौर था, जब लालू प्रसाद बिहार के अजेय राजा माने जाते थे, जिन्होंने सत्ता गंवाने के बाद भी उसकी डोर बड़ी चतुराई से अपने हाथों में रखी। वे पिछड़ों के मसीहा बनकर राजनीति करते रहे और इसका लाभ उन्हें हमेशा मिला।

अदालती फैसलों के कारण वे खुद तो चुनाव नहीं लड़ पाए, फिर भी बिहार की जनता ने पिछले चुनावों में उनका साथ दिया, उनके दोनों बेटों को बहुमत से जिताया। नीतीश कुमार के साथ लालू प्रसाद ने बिहार की सरकार बनवाई, हालांकि बाद में नीतीश ने भाजपा का दामन फिर से थामा, तो लालू प्रसाद को एक बार फिर सत्ता से बेदखल होना पड़ा।

विपक्ष में रहते हुए वे लगातार बिहार सरकार और केेंद्र सरकार की नीतियों की खिंचाई करते रहे। कुछ दिन पहले ही जब टू जी स्पेक्ट्रम मामले में तमाम आरोपियों को अदालत ने बरी कर दिया, तो लालू प्रसाद यादव को भी उम्मीद बंधी कि उनके साथ भी ऐसा ही कुछ हो सकता है। लेकिन रांची की अदालत ने उनके समेत 16 आरोपियों को दोषी माना, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र समेत छह लोगों को निर्दोष करार दे दिया। ऐसा लग रहा है कि आने वाले साल की शुरुआत लालू प्रसाद के लिए तकलीफदेह रहेगी, क्योंकि 3 जनवरी को सजा का ऐलान होगा और मुमकिन है वे फिर कुछ समय के लिए जेल चले जाएं।

इधर प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने उनकी बेटी-दामाद, बेटों पर भी शिकंजा कसना शुरु कर दिया है। जाहिर है यह वक्त पूरे यादव परिवार के लिए चुनौतियों भरा है और उनके साथ-साथ राषट्रीय जनता दल के लिए भी, जो एक तरह से पारिवारिक पार्टी ही बन गई है। लालू प्रसाद के बाद अब उनके बेटे और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर सबकी निगाहें हैं। अब तक उनके सरकार विरोधी तेवर खूब नजर आते रहे हैं, लेकिन आगे भी वे क्या इसी दमखम को बरकरार रखेंगे? अपने पिता की साक्षात मौजूदगी के बिना क्या उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा पाएंगे? यह देखने वाली बात होगी। 

 
बिहार में कांग्रेस राजद की सहयोगी है और आगे भी यह करार बरकरार रहेगा, ऐसा कहा जा रहा है। ऐसे में भाजपा को कांग्रेस को घेरने का मौका मिल रहा है, क्योंकि इन्हीं लालू प्रसाद की संसद सीट को बचाने के लिए जब यूपीए सरकार अध्यादेश लाई थी, तो राहुल गांधी ने उसे फाड़ दिया था, लेकिन अब उनके ही नेतृत्व में कांग्रेस फिर उनका साथ दे रही है। इस तरह भ्रष्टाचार पर कांग्रेस के रूख पर सवाल तो खड़े होते हैं। लेकिन जब भाजपा कांग्रेस पर उंगली उठाएगी, तो बाकी तीन उंगलियां उस पर भी उठेंगी। हाल ही में हिमाचल चुनाव के ऐन पहले उसने सुखराम को अपने साथ लिया, जबकि एक वक्त इन्हीं सुखराम पर भ्रष्टाचार के कथित आरोप के कारण भाजपा ने संसद चलने नहीं दी थी। इसी तरह कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं को भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बावजूद भाजपा का वरदहस्त मिलता रहा है। जब नोटबंदी के कारण देश में त्राहि-त्राहि मची थी, तब रेड्डी परिवार में पानी की तरह पैसे बहाते हुए विवाह समारोह हुआ था।

मध्यप्रदेश हो या छत्तीसगढ़, गुजरात हो या राजस्थान, भ्रष्टाचार के मामले तो हर जगह हो रहे हैं। इसलिए भ्रष्टाचार को किसी एक दल या नेता की खासियत नहीं कहा जा सकता, बल्कि सारी राजनीति ही इसमेंं लिपटी हुई है। अदालतें सबूतों के आधार पर फैसले लेती हैं, तो कभी कोई दोषी होता है, कभी कोई बरी। लेकिन इससे भ्रष्टाचार खत्म नहीं होता। इसलिए इन फैसलों के राजनीतिक लाभालाभ से परे उठते हुए, देश में जांच एजेंसियों को और सशक्त तथा स्वायत्त बनाने की जरूरत है, ताकि शासन और प्रशासन सही मायनों में पारदर्शी और निष्पक्ष बने, तभी भ्रष्टाचार को कम किया जा सकेगा। 

Source:Agency

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